पूर्वोत्तर और नागा समस्या

भारत की आजादी के समय तक नागा जीवन उनके समाज के नियमों द्वारा संचालित होता था। वे उन्हीं को आधार बना उसे चलाना चाहते थे। आज भी नागा एक शासन व्यवस्था के अन्दर नहीं लाये जा सके हैं। नागा भूमि तो देशों और भारत के अन्दर अनेक प्रदेशों में बंटी है।

भारतीय हिमालय में कई प्रकार के लोग और जातियाँ रहती हैं। हमारे पढ़े लिखे लोग भी अधिकांश से परिचित नहीं हैं। भारत के ठेठ उत्तरपूर्व में एक जाति है नागा। वह असम से अरुणांचल प्रदेश और मणिपुर के पहाड़ों और पूर्व में म्यांमार तक फैली है।

भारत की आजादी के समय तक नागा जीवन उनके समाज के नियमों द्वारा संचालित होता था। वे उन्हीं को आधार बना उसे चलाना चाहते थे। आज भी नागा एक शासन व्यवस्था के अन्दर नहीं लाये जा सके हैं। नागा भूमि तो देशों और भारत के अन्दर अनेक प्रदेशों में बंटी है। नागा भूमि के चारों और कई क्षेत्र मिश्रित आवादी वाले हैं। जहाँ नागा कूकी, मैतेई, असमी इत्यादि के साथ रहते हैं। मणिपुर में कई नागा क्षेत्र घाटी के उखरुल, माओ तामेंगलोंग ,सेनापति और चंदेल जिलों में मैतेई के अंतर्गत और अरुणांचल के तिराप व चांगलांग में नागा आबादी रहती हैं। भारत के सीमा से लगे म्यांमार (बर्मा) के नागा यांगून से शासित होते हैं।

दोनों ओर के नागा अंतर्राष्ट्रीय सीमा से न परिचित हैं और न उसे मानते हैं। यह सीमा रेखा केवल कागजों और नक्शों तक सीमित है। भारत के मौन और तुएनसांग जिलों में यदि इस सीमा रेखा को धरती में उतारा जाय तो वह घरों को विभाजित कर देगी. बाप का कमरा भारत में होगा तो पुत्र का म्यांमार में।

म्यांमार में नागाओं का जीवन कठिन है। वे नमक, लोहा इत्यादि आवश्यक वस्तुए लेने आज भी कभी नागालैंड – असम के हाट बाजारों में आते हैं। नागालैंड में कुछ अच्छे स्कूल होने से म्यांमार के समृध नागा अपने बच्चों को वहाँ पढ़ने भेजते हैं। सरहद के लोग अपने को जातियों के नाम से जानते हैं न ही राष्ट्रीयता से। पूछने पर वह कहेंगे की हम फोम हैं, खिमनुगन हैं, पौन्चुरी हैं, इमंचुन्गड़ हैं, संगतम हैं, कोनयाक हैं या तंगशा है। शायद वो ये भी ना कहैं कि नागा हैं।

अंग्रेज अपने जाने तक इस खोज में ही लगे रहे कि इन जातियों से कैसे व्यवहार करना चाहिए? उन्हें राज्य का अंग बनाने के लिए उनके साथ कैसा समझौता करना चाहिए? ब्रिटिश साम्राज्य के लिए वे कम जनसँख्या वाले दूर दराज के इलाके थे और उनसे सत्ता का तुरंत कोई फायदा भी न था। हाँ, उन वनवासी के पास के बर्मा के क्षेत्रों में अंग्रेजों ने तेल का विशाल भण्डार ढूंढ लिया था और वहाँ बर्मा आयल कंपनी स्थापित कर काफी मुनाफा कमाना आरम्भ कर दिया था। उनके जंगलों में थे सैकड़ों साल पुराने ऊँचे ऊँचे सागौन के दरख़्त। तराई में इतना धान उगता था कि उससे भारत ही नहीं, विश्व के एक बड़े हिस्से के मनुष्यों का पेट भर सकता था।

नागा समाज संस्कृति से परिचित होने से पूर्व ही अंग्रेजों को अपने शक्तिबल से यह बतलाना था कि वे सब वनवासी अब विलायती सत्ता के अधीन हैं और उन्हें अब नई सत्ता के कायदे कानून मानने होंगे। इसके लिए वहाँ पुलिस चौकियाँ, नाके खोले जाने लगे। नागा जब असम के हाट बाज़ारों में नमक, लोहा इत्यादि खरीदने या वन सामग्री बेचने आते तो अपने भाले साथ लेकर चलते। ब्रिटिश शासन द्वारा अब उन्हें भाला लेकर चलने से रोक दिया गया था। लगातार हो रही भूमि सर्वे से वे सशंकित होने लगे थे। इन सब कारणों से 1854 से 1865 के बीच अंगामी (तेनेम) नागाओं ने पुलिस चौकियों और नाकों में 19 बार हमले हमले कर 232 लोग मार डाले थे। इसके उत्तर में अंग्रेज सरकार ने तय किया कि वो सब नागा गाँव जिनपर हमले का शक होता है, जला दिए जाएँ। इस तरह 1866 में राजाफेमा और 1880 में खोनोमा गाँव जला कर राख कर दिये गए।        

भारतीय उपमहाद्वीप में द्वितीय महायुद्ध नागलैंड के मुख्य नगर कोहिमा, तथा उसके अन्य क्षत्रों में लड़ा गया था। एक भीषण युद्ध में अंग्रेज सेना ने जापानियों को नागालैंड से बाहर खदेड़ दिया था। इस लडाई में जापानी और अंग्रेज़ बहुत से हथियार नागा क्षेत्र में छोड आए थे। नागाओं को हथियारों से बहुत प्रेम था। उन्होंने वे सब हथियार अपने घरों तथा जंगलों में छिपा कर रख लिए!

अंग्रेज़ी राज्य जाने के बाद नागा समाज में सवाल उठा कि वह अपना समाज तथा क्षेत्र किस प्रकार से चलाएगा? जो उन पर राज कर रहे थे वे चले गए थे। भारत के नेताओं का इन जातियों से न कोई संपर्क रहा और न इससे व्यवहार करने का कोई अनुभव। अंग्रेजी राज्य की समाप्ति के बाद यह जातियाँ बिना उनसे पूछे भारत या म्यांमार का भाग बन गई, किन्तु उनका जीवन वैसा ही बना रहा जैसा पहले था।

स्वतंत्र भारत के नेताओं से नागा लोग परिचित नहीं थे। वे नागाओं से कैसा व्यवहार करेंगें उसका नागाओं को पता न था! इसलिए वे सशंकित थे। इस असमंजस के कारण असम के प्रथम भारतीय राज्यपाल, सर अकबर हैदरी, नागा मुख्यालय, कोहिमा आए, जहाँ उन्होंने नागा नेताओं से स्वतंत्र भारत सरकार की ओर से एक समझौता किया जिसमें कहा गया कि उस क्षेत्र में राज्य वैसे ही चलाया जाएगा जैसे पहले से चलाया जा रहा था और दस वर्षों बाद स्थिति की समीक्षा की जाएगी कि वहाँ राज्य का स्वरूप कैसा होगा!

नागा अपने राजनैतिक भविष्य को लेकर चिंतित थे और आपस में विमर्श कर रहे थे कि उनके राज्य का स्वरूप क्या होगा? उनके नेता, ज़ापू फीज़ो, जो दक्षिणपूर्व एशिया से अपनी भूमि, नागा पहाड़ों में लौट आए थे, ने कहना शुरू किया कि अंग्रेज़ों के आने से पूर्व नागा स्वतंत्र थे। उनके स्वतंत्र क्षेत्र पर अधिकार कर अंग्रेज़ों ने उस पर राज किया। अब जब अंग्रेज़ चले गए हैं तो नागा पुनः पहले की भांति स्वतंत्र हो गए हैं। यद्यपि भारत ने अपनी सरकार वहाँ स्थापित कर ली थी, तब भी यह बात लोगों के दिलों में बनी रही। कालांतर में वहाँ कुछ घटनाएँ ऐसी घटीं जिनसे नागा लोग उद्वेलित हो उठे। पंगशा की घटना, जहाँ आपसी झगड़ों में कुछ नागा लोग मारे गए थे। भारतीय सरकार ने तब वहाँ शांति स्थापित करने अपनी फौज भेजी, जिसे शांति बहाली के लिए कुछ नागा गाँव वालों को मारना पडा। इस घटना के कारण नागा बाहर से आए (भारतीय) लोगों के प्रति क्रोधित तथा अशांत हो उठे। यह भारत के प्रति दुर्भावना का पहला अनुभव था।

स्वतंत्रता के बाद नागा नेता, ज़ापू फीजो, सिंगापुर से अपने कोहिमा के करीबी गांव, खोनोमा, वापस लौट थे। उन्हौंने देखा कि नागा लोग पंगशा की घटना से भारत से नाराज और बहुत दुखी थे़। कुछ गांववालों की सलाह से उन्होंने एक संस्था, नागा नेशनल काउंसिल गठित की, जो कहने लगी कि अंग्रेज़ों के जाने के बाद नागा पहले की भांति स्वतंत्र हो गए हैं तथा भारत के अधिकार में नहीं रहना चाह्ते!

अपनी संस्था, नागा नेशनल काउंसिल का जापू फीज़ो ने नागा भूमि में विस्तार किया। इस प्रकार नागा स्वतंत्रता की माँग उठी, जो फिर दबी नहीं और बनी रही! नागा हिल्स, जिसे भारत ने बाद में नागालैंड नामक एक अलग राज्य बनाया, कुछ वर्षों तक असम का एक जिला (जनपद) ही बना रहा।

फीज़ो नागा नेशनल काउंसिल का विस्तार कर कुछ समय बाद पूर्वी पाकिस्तान में ढाका से होते हुए लंदन चले गए, जहाँ उन्होंने अपना कार्यालय खोल स्वतंत्र नागालैंड की मांग को जारी रखा। इस बीच 1962 में भारत का चीन से सरहदी युद्ध हो गया, जिसके बाद चतुर नागा नेताओ ने अपने लोग हथियार लाने चीन भेजने शुरू किये किए। हथियारों की बहुलता के कारण नागा युद्ध और प्रबल हो गया। भारत सरकार ने नागालैंड नाम के एक नए राज्य का गठन किया था, किन्तु उससे लड़ाई समाप्त नहीं हुई।

नागा नेताओं से भारत सरकार ने समझौते के प्रयास जारी रखे। इस बीच उनके प्रमुख नेता तथा वार्ताकार, इसाक चिसी सू की मृत्यु हो गई और मणिपुर के तांखुल नागा नेता, मुईबा, भूमिगतों के प्रमुख बन गए। उनके दल से अब भारत के अधिकारी वार्ता कर रहे हैं। समस्या सुलझाने के प्रयास होते रहते हैं किन्तु देश की जनता को नहीं बतलाया जाता कि नागा समस्या पर सरकार क्या कर रही है? केवल कहा जाता है कि समस्या सुलझाने के प्रयास हो रहे हैं!

भारत की स्वतंत्रता के समय से ही जापू फीज़ो द्वारा संगठित एक दल नागा संप्रभुता के लिए लड़ने के लिए खडा हो गया था। अब फीज़ो का देहांत हो गया है किन्तु जो दल उन्होंने गठित किया था वह अभी भी नागा नेशनल सोशलिस्ट काऊंसिल के नाम से नागालैंड, मणिपुर तथा असम के पूर्वी सरहदी इलाकों में सक्रिय है।

दरअशल नागा समस्या बहुत जटिल है. उसको सुलझाने के लिए बहुत से भारतीय चिंतकों को प्रयास करने पडेंगे। उसे एक व्यक्ति पर छोडने से समस्या का हल नहीं हो पाएगा। भारत के अन्य चिंतको का सहयोग लेने का प्रयास करना पडेगा। ऐसा अभी तक हुआ नहीं है। नागा लोगों को किस प्रकार का खतरा भारत से लगता है इस मनोविज्ञान को समझना जरुरी होगा।

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श्री हरिश्चंद्र चंदोला समय समय पर भारत के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में अनेक लेख लिखकर नागा समस्या की हकीकत को देश के सामने लाने का प्रयास करते रहे हैंभारत के तीन प्रधानमंत्रियों, जवाहरलाल नेहरु, लालबहादुर शास्त्री और इंदिरा गाँधी, ने उन्हें नागा विद्रोहियों से वार्ता करने की जिम्मेदारी भी सौंपी। उनकी पुस्तक नागाकथानागा असंतोष और नागा मनोविज्ञान के कई अनछुए पहलुओं को सामने लाती है।

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