पहाड़ द्वारा अपनी शुरुआत से ही सामाजिक-बौद्धिक विमर्श को आगे बढ्ने के लिए व्याख्यान शृंखला की परिकल्पना की गई थी। इस शृंखला में हिमालय के विविध आयामों पर चर्चा करने के लिए विषय वस्तु को सामाजिक पारिस्थितिकी, आर्थिकी, पर्यावरण और हिमालयी लोक संस्कृति पर केन्द्रित करने का निर्णय लिया गया था। सबसे पहले हिमालय और अन्य पर्वतों के विभिन्न पहलुओं पर व्याख्यान शुरू करने के लिए राहुल सांकृत्यायन का नाम हमारे दिमाग में आया। हिमालयी लोक संस्कृति पर केन्द्रित व्याख्यान, उत्तराखंड के चार लोक दिग्गजों-गोपी दास,मोहन सिंह रीठागाड़ी,झुसिया दमाई और केशव अनुरागी को समर्पित करने का निर्णय लिया गया। इस तरह दो स्मारक व्याख्यान शृंखलाओं को आरंभ करने का सिलसिला शुरू हुआ।
राहुल सांकृत्यायन स्मारक व्याख्यान हिमालय और उसके लोगों से जुड़े किसी भी पहलू,समस्या या मुद्दे के लिए समर्पित है। इस शृंखला के अंतर्गत अब तक 15 व्याख्यान आयोजित किए जा चुके हैं। पहला व्याख्यान 1986 में पी.सी.जोशी द्वारा ‘स्थानीयता बनाम राष्ट्रीयता’ विषय पर दिया गया था। तत्पश्चात अलग अलग विषयों पर अनिल अग्रवाल, डी.डी.पन्त, यशोधर मठपाल, डी.पी.अग्रवाल, ए.एन.पुरोहित, कृष्ण नाथ, गुणाकर मुले, डी.डी.शर्मा, शंकर लाल शाह, के.एस.वल्दिया, ए.डी. मोदी, आशीष कोठारी और पी. साईंनाथ द्वारा व्याख्यान दिये। इसी क्रम में रामचन्द्र गुहा द्वारा ‘हिमालय में युद्ध और शांति’ विषय पर व्याख्यान दिया गया।

पहाड़ द्वारा इस वर्ष 8 फरवरी 2025 (शनिवार) को राहुल सांकृत्यायन स्मारक व्याख्यान शृंखला का 16वां व्याख्यान आयोजित किया जा रहा है। यह व्याख्यान संस्कृत के मूर्धन्य विद्वान प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी द्वारा दिया जाएगा। व्याख्यान का विषय ‘संस्कृत साहित्य में हिमालय’ है। व्याख्यान 8 फरवरी 2025 (शनिवार) को सायं 3.30 बजे से आनलाईन आयोजित किया जाएगा।
प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी संस्कृत को आधुनिकता के साथ जोड़ कर देखने वाले देश में संस्कृत के वरिष्ठतम आचार्यों और विद्वानों में से एक हैं। संस्कृत भाषा के प्रतिष्ठित साहित्यकार के रूप में जाने जाने वाले प्रो त्रिपाठी साठ के दशक से निरंतर संस्कृत साहित्य में शोध कर रहे हैं। प्रोफेसर त्रिपाठी शिल्पकार्न विश्वविद्यालय,बैंकॉक एवं कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क में संस्कृत के विजिटिंग प्रोफेसर और राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, नई दिल्ली के कुलपति भी रहे हैं।
साहित्यिक-सांस्कृतिक योगदान के लिए प्रो.राधावल्लभ त्रिपाठी को 1994 में उनके कविता-संग्रह ‘संधानम्’ के लिये साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इसके अतिरिक्त आपको बिरला फ़ाउंडेशन के ‘शंकर पुरस्कार, 2016 में ‘पंडित राज सम्मान’, मीरा सम्मान सहित विगत वर्षों में अनेक संस्थाओं एवं अकादमियों द्वारा विभिन्न पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।
अब तक प्रो. त्रिपाठी की सौ से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है जिनमें ‘संस्कृत कविता की लोकधर्मी परम्परा’,‘काव्यशास्त्र और काव्य’,‘लेक्चर्स ऑन नाट्यशास्त्र विश्वकोश’ (चार खंड) आदि विशेष चर्चित रहे हैं।
‘सन्धानम्’,‘लहरीदशकम्’,‘सम्प्लवः’,‘समष्टि’ उनके प्रमुख संस्कृत काव्य-संग्रह हैं। इसके अतिरिक्त संस्कृत में तीन उपन्यास,दो कहानी-संग्रह,तीन पूर्णाकार नाटक तथा एक एकांकी-संग्रह भी प्रकाशित हुये हैं। ‘दमयन्ती’ एवं ‘भुवनदीप’ (नाटक), ‘पूर्वरंग’,‘पागल हाथी’ एवं ‘जो मिटती नहीं है’ जैसे कहानी संग्रह,और हिन्दी उपन्यास के रूप में ‘सत्रन्त’ एवं ‘विक्रमादित्य कथा’ उनकी रचनाएँ हैं। उन्होंने संस्कृत की करीब दो दर्जन कृतियों के हिंदी और अँग्रेजी में अनुवाद भी किए हैं जिनमें ‘वेदांतसार’, ‘कुमारसंभवम्’, ‘कुंदमाला’, ‘वेणीसंहार’ आदि शामिल हैं। उन्होंने ‘कामसूत्र’ का न केवल अँग्रेज़ी अनुवाद किया बल्कि उसपर टीका लिख कर अनेक भ्रांतियों को भी तोड़ा है। प्रो.त्रिपाठी ने ‘नवस्पंदः’, ‘आयाति’, ‘षोडसी’, ‘शुकसारिका’ आदि का सम्पादन भी किया है। ‘वाद और संवाद की भारतीय परंपराएँ’ भारतीय चिंतन परंपरा को सामने लाने वाली उनकी महत्वपूर्ण कृति है।
16वां राहुल सांकृत्यायन स्मारक व्याख्यान, प्रो.राधावल्लभ त्रिपाठी के माध्यम से हिमालय को साहित्य के नजरिए से समझने की कोशिश है। हिमालय के साथ-साथ साहित्य में रुचि रखने वाले सभी लोग इस व्याख्यान में सादर आमंत्रित हैं।

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