अलविदा त्रेपन सिंह चौहान!

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आखिर परम मित्र त्रेपन सिंह चौहान ने 13 अगस्त, 2020 की सुबह 6.30 बजे देहरादून के एक अस्पताल से इस इहलोक को अलविदा कह ही दिया। अभी तो वह अपने नाम के अनुरूप 53 वर्ष का भी नहीं हो पाया था। उसके हिस्से बहुत सारे काम थे, जिनको पूरा करने का उसने वायदा भी किया था। पर सब कुछ कहाँ अपने मन-मुताबिक होता है, जिदंगी में। हमें मालूम था कि वह कुछ ही समय का मेहमान है। पर कहते हैं ना कि, जब तक साँस है तब तक आस है। यही एकहरी जीवनीय साँस वह पिछले दो साल से ले रहा था। और इसी इकहरी साँस के बदौलत उसने दुनिया को सामाजिक दायित्वशीलता के प्रति अपनी जीवटता, समर्पण और अदम्य साहस का प्रमाण दिया। वह जीवन भर एक वीर योद्धा की तरह हर मोर्चे पर लड़ता रहा। और उसी तरह इस जीवनीय लड़ाई को उसने विराम दिया।

त्रेपन की छवि मेरे मन-मस्तिष्क में ‘विश्व प्रसिद्ध साहित्यकार हावर्ड फास्ट के नायक ‘स्पार्टाकस’ की तरह है जो कि सामाजिक-राजनैतिक सत्ता के अन्याय के विरुद्ध हमेशा आन्दोलित रहता है। ‘स्पार्टाकस’ का निजी जीवन भी संघर्ष की सेज पर है परन्तु अपने स्वाभाविक स्वभाव से उसके व्यक्तित्व में हर समय मनमोहक मुस्कान, प्रेम और खुशियों के गीत समाये रहते हैं। क्योंकि वह आश्वत है कि आने वाला कल आज से बेहतर होगा। यही सकारात्मकता उसे अन्याय से लड़ने की ताकत और जीने का घैर्य प्रदान करता है’।

त्रेपन सिंह चौहान देश में सामाजिक आन्दोलनों और साहित्य का एक जाना-पहचाना लोकप्रिय नाम था। उसका विजन व्यापक था। वह केवल उत्तराखंड में ही नहीं सिमटा था। सभी जन-संगठनों में उसकी लोकप्रियता, पहुँच और पकड़ मज़बूत थी। जन आन्दोलनों में रहकर जो साहित्य उसने रचा वो कल्पना की डोर के बजाय धरातलीय विषयों से जीवंत होकर, सामाजिक – राजनैतिक अन्याय के खिलाफ बोधगम्य और किस्सागोई रचना शैली में मुखरित हुआ है। तभी तो, उनके साहित्यिक पात्र आज के समाज की विसंगतियों, चिंताओं, समस्याओं और उनके समाधानों पर संवाद करते हुए कहते हैं कि-

निराशा के आगे एक रोशनी है,
जरा घर से निकल के देखो यारों,
जो लोग सड़कों पर लड़ रहे हैं
उनके साथ जरा मुठ्ठी तो तानो यारों।

साहित्यकार त्रेपन चौहान की रचनाओं के इन पात्रों की बात पर गौर करें तो लगेगा कि वे हर समय समाज की बेहतरी के लिए अपने – अपने मोर्चों पर पूरी ताकत से लड़ रहे हैं। वे आन्दोलनों के तात्कालिक प्रभाव के साथ – साथ भविष्य की सामाजिक संरचना के प्रति भी सचेत हैं-

‘जब नया राज्य बनेगा तब तो और भी बुरा वक्त आ सकता है। क्योंकि सत्ता तब इनके हाथ में रहेगी। और मेरा मानना है कि अभी लोग सड़कों पर आन्दोलित हैं इसलिए ‘कैसा हो उत्तराखंड’ के सवालों को भी हमें लोगों के बीच में छोड़ना चाहिए। लोग चाहे आपको पागल ही क्यों न कहें। मैं कम से कम अपनी आत्मा की आवाज को अनुसुना करके नहीं चलूंगा। यह लोगों के साथ गद्दारी होगी। हरीश  ने दृढ़ता से कहा।’ (यमुना उपन्यास)

‘जिस राज के लिए हमने इतना कुछ बर्बाद किया उस राज का फैदा हमारे भाई बंदों को मिलना चाए। इन फैक्ट्रीयों से हमको फैदा मिलना तो दूर वो हमारे छोरों का खून चूसने वाली जोंक बनकर आए हैं इस राज में। अपना हाड़-मांस गलाकर हम इन बच्चों को जवानी दे रहे हैं और वे इस जवानी को चूसकर बर्बाद कर रे हैं। यमुना की नसों में खून का संचार कुछ उबलने वाले रूप में दौड़ने लगा था। वह गुस्से में बोली, ‘‘अब तू देरादून नी जाएगा। कतै नी जाएगा।’’ (हे ब्वारी ! उपन्यास)

त्रेपन सिंह चौहान का जन्म 4 अक्टूबर, 1971 को केपार्स, बासर टिहरी (गढ़वाल) में हुआ। डीएवी कालेज, देहरादून से वर्ष1995 में एम.ए. (इतिहास) करने के बाद सामाजिक सेवा की राह उसने अपनाई। जीवकोपार्जन के लिए नौकरी या व्यवसाय करने की उसको सूझी ही नहीं। अपने गृहक्षेत्र में 16 मार्च, 1996 को ‘चेतना आंदोलन’ की शुरुवात उसने भ्रष्टाचार के खिलाफ भिलंगना व्लाक आफिस पर तालाबंदी करके की थी। उसके बाद ‘जल – जंगल – जमीन हमारी, नहीं सहेंगे धौंस तुम्हारी’ की तर्ज पर आन्दोलन दर आन्दोलन में वह अग्रणी भूमिका में सक्रिय रहने लग गया। उत्तराखंड आन्दोलन, शराबबंदी आन्दोलन, टिहरी बांध से प्रभावित फलेण्डा गाँव आन्दोलन, भ्रष्टाचार के खिलाफ सूचना के अधिकार का आन्दोलन, नैनीसार आन्दोलन, आदि के जरिए वह देश भर में चलाये जा रहे कई आन्दोलनों से जुड़ गया। वह राष्ट्रीय जनतांत्रिक समन्चय और उत्तराखंड नव निर्माण मजदूर संघ के संस्थापक सदस्य था। सामाजिक जागरूकता और अन्याय के विरुद्ध सक्रिय होने के कारण समय-समय पर शासन-प्रशासन के कोपभाजन की यंत्रणा को भी उसने सहा । नतीजन, जेल और मुकदमों से उसका नजदीकी नाता रहा।

एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में त्रेपन सिंह चौहान ने श्रम के सम्मान के लिए अनेक जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन किया। ‘घसियारी हो या मजदूर, श्रम का सम्मान हो भरपूर’ नारे के तहत ‘घसियारी प्रतियोगिता’ का आयोजन करना उसका एक अभिनव प्रयोग रहा है। यह बहुप्रचारित किया जाता है कि पहाड़ के ग्रामीण अर्थतंत्र की रीड़ महिलायें हैं। गांव की किसानी में पुरुषों और पषुओं के सम्मलित योगदान से कहीं ज्यादा महिलाओं का व्यक्तिगत योगदान है। फिर भी उनके योगदान को उत्पादक और सम्मानयुक्त मानने में सारा समाज हिचक जाता है। उदाहरणार्थ ‘घास छीलना’ और ‘घास काटना’ शब्दों का प्रयोग अक्सर बेकारी के संदर्भ में किया जाता है। पर यही घास काटना ग्रामीण महिलाओं के लिए अपनी दिनचर्या का सबसे अहम काम है। पहाड़ की घसियारिन मातायें और बहिनें पहाड़ के पूरे पारिस्थिकीय तंत्र को बचाये रखती हैं। इस नाते वे ‘बेस्ट इकोलॉजिस्ट’ की भूमिका में हैं। त्रेपन का मानना था कि पहाड़ी गांवों में पली-बढ़ी हमारी पीढ़ी जो बाद में नगरों में जा बसी है इन्हीं घसियारिनों याने ‘बेस्ट इकोलॉजिस्ट’ की संतान हैं। हमारी ‘बेस्ट इकोलॉजिस्ट’ माताओं ने पहाड़ के गांवों की सामुहिक दायित्वषीलता वाली संस्कृति को जीवंत रखा है। गांवों में घसियारिनों के गीतों की लोकप्रियता इसी कारण सर्वाधिक है।

त्रेपन ने माना कि जब गाँव की महिलायें ‘बेस्ट इकोलाजिस्ट’ हैं तो फिर उनके काम के प्रति इतना अनादर क्यों हैं ? इसी विडम्बना को समाप्त करने के लिए उसने वृहद स्तर पर ‘घसियारी प्रतियोगिता’ का आयोजन की परम्परा प्रारम्भ की। जिसका ध्येय विचार रहा है ‘पहाड़ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में घसियारिनों के श्रम को सम्मान एवं उसे और उत्पादक बनाना।’ इसके तहत दिसम्बर, 2015 में भिलंगना ब्लाक, टिहरी गढ़वाल की 112 ग्राम पंचायतों की 600 से अधिक महिलाओं ने ‘घसियारी प्रतियोगिता’ में भाग लिया। इस प्रतियोगिता का समापन 6 जनवरी 2016 में चमियाला के कोठियाड़ा गाँव में हुआ। इसी प्रकार दूसरी ‘घसियारी प्रतियोगिता’ 22 दिसम्बर, 2016 को अखोड़ी गाँव में सम्पन्न हुई।

त्रेपन की यह अनोखी प्रतियोगिता आज भी ग्राम पंचायत, न्याय पंचायत के बाद ब्लाक स्तर पर सम्पन्न होती हैं। प्रतियोगिता के अर्न्तगत 2 मिनट में सबसे ज्यादा घास काटनी होती है और इसमें यह घ्यान रखा जाता है कि घास के साथ अन्य उपयोगी पौधें न कटे। इसके तहत प्रथम विजेता को 1 लाख, द्वितीय को 51 हजार और तृतीय को 21 हजार रुपये का पुरस्कार दिया जाता है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आयोजन के लिए संपूर्ण व्यय राषि को स्थानीय जनता स्वयं ही जुटाती है। भिलंगना ब्लाक में सफलता के बाद यह ‘घसियारी प्रतियोगिता’ कुमाऊं के गरुड क्षेत्र में भी आयोजित की जाने लगी है।

त्रेपन चौहान ने अपनी धर्मपत्नी नीमा चौहान के सहयोग से चमियाला क्षेत्र में गुणवत्ता पूर्ण एवं रोजगारपरख शिक्षा के लिए प्रयास किए। स्थानीय परिवेश आधारित 2 विद्यालय उनके द्वारा संचालित किए जा रहे हैं। इन स्कूलों में स्थानीय किसान, पषुपालक, घसियारिन, षिल्पी आदि टीचर के रूप में अपने विभिन्न अनुभवों और ज्ञान को नियमित रूप में बताते हैं। बच्चे अपने गाँव-इलाके के पारिस्थिकीय तंत्र को जानने को उत्सुक रहते हैं। बच्चों की एक रिपोर्ट विषेष उल्लेखनीय है कि जिसमें कहा गया है कि औसतन प्रत्येक गाँव से साल भर में 4 लाख रुपये खर्च करने के बदले में 40 लाख रुपये के उत्पाद सरकार स्वयं ले जाती है।

सामाजिक कार्यकर्त्ता और चिंतक के समानान्तर त्रेपन सिंह चौहान के व्यक्तित्व के दूसरे पक्ष ने उन्हें एक संवेदनशील रचनाकार की पहचान दी। उनका रचना संसार व्यापक और बहुआयामी है। परन्तु सामाजिक सवाल और संघर्ष की आवाज उनके संपूर्ण लेखन के ‘तल और तट’ पर हर समय मौजूद रहते हैं। उनकी प्रकाषित रचनाओं में ‘सृजन नव युग’, ‘यमुना’, ‘भाग की फांस’, ‘हे ब्वारी !’ (उपन्यास), उत्तराखंड आन्दोलन का एक सच यह भी (विमर्ष), पहले स्वामी फिर भगत अब नारायण (कहानी),  सारी दुनिया मागेंगे (संपादन-जनगीतों का संकलन), गढ़वाली साहित्य की झलक, कुमाऊंनी साहित्य की झलक (साहित्य एकेडमी की द्वैमासिक पत्रिका इंडियन लिट्रेचर में प्रकाषित), टिहरी की कहानी (कहानी संग्रह-कन्नड़ भाषा में), उत्तराखंड आन्दोलन (विमर्ष, कन्नड़ भाषा में), भावानु ढोल और बांध (कन्नड़ भाषा में), प्लॉट (कन्नड़ भाषा में), आदि हैं।

साहित्य उपक्रम से प्रकाशित उनके उपन्यास ‘युमना’ (वर्ष-2007 एवं 2010) और उसके दूसरे भाग ‘हे ब्वारी !’ (वर्ष-2014) ने उन्हें हिन्दी साहित्य में शानदार प्रतिष्ठा प्रदान की है। उत्तराखण्ड आन्दोलन के दौरान पहाड़ी गाँव का सामाजिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिवेश कैसे करवट बदल रहा था, इसी कथानक पर ‘यमुना’ और उसका दूसरा भाग ‘हे ब्वारी !’ उपन्यास ने आकार लिया है। ये उपन्यास उत्तराखण्ड के ग्रामीण जनजीवन की जीवन्तता, जीवन शैली की सहजता, अभावों में जीते हुए परन्तु भविष्य के प्रति हमेशा आशावान समाज की मनःस्थिति को दर्शाते हैं। शहर और कस्बों से आयी तथाकथित विकास की बातों ने पहाड़ी ग्रामीण जीवन में कैसे दस्तक दी, उपन्यास का कथानक इससे प्रारम्भ होता है। सीधे-सरल और आत्मनिर्भर जीवन के आदी ग्रामीण इन आहटों से अचंभित होते है। वे अपने जीवन के सवालों का समाधान शहरी जीवन में खोजना शुरू कर देते हैं। लेकिन षहरी जनजीवन के मोह में उन्हें मालूम नहीं चल पाता कि तथाकथित विकास की यह प्रवृत्ति अपने साथ कई सामाजिक विकृतियों को भी साथ ला रही हैं।

‘यमुना’ मात्र एक पात्र नहीं है वरन् उसके व्यक्तित्व में पहाड़ी जनजीवन के कई पात्रों का चेहरा और दायित्व समाया हुआ है। वह खुद के लिए तो कभी जीती ही नहीं है। उसका सम्पूर्ण चिन्तन अपने परिवार से शुरू होकर पूरे समाज को खुशनुमा बनाने की ओर है। उसकी जीवटता में समायी सहजता सबका मन मोह लेती है। यह उपन्यास इंगित करता है कि पृथक राज्य आन्दोलन के दौरान एक आम आदमी नए राज्य की परिकल्पना में अपनी समस्याओं के समाधानों का कैसे स्वप्न देखता था। छदम वेश में आन्दोलन में घुसे भ्रष्ट लोगों की ओर यह उपन्यास इशारा करता है। उपन्यास आन्दोलन के दौरान शिल्पकारों की उपेक्षा एवं आशंका तथा ‘आज दो अभी दो उत्तराखण्ड राज दो’ के विचार ने ‘कैसा हो उत्तराखण्ड’ के गम्भीर सवाल को कैसे नेपथ्य में खिसका दिया की ओर इषारा करता है। इस प्रकार यह उपन्यास उन पक्षों को भी बताता है कि कहाँ-कहाँ पर आन्दोलनकारियों से चूक हुयी थी। इन अर्थों में ‘यमुना’ उपन्यास को मात्र उपन्यास के बतौर ही नहीं देखा एवं पढ़ा जाना चाहिए वरन् उत्तराखण्ड आन्दोलन को जानने एवं समझने के लिए एक जीवंत दस्तावेज और सन्दर्भ साहित्य के रूप में भी उसकी हमेशा अहमियत रहेगी। वैसे उत्तराखण्ड आन्दोलन पर अब तक ढेर सारा लिखा गया है, परन्तु उस दौर के ग्रामीण पृष्ठभूमि पर केन्द्रित ‘यमुना’ और ‘हे ब्वारी !’ उपन्यास अपने आप में अलग भाव एवं सन्देश प्रदान करते है।

पिछले कुछ सालों से ‘मोटर न्यूरोन्स डिसऑर्डर’ बीमारी से त्रेपन उभर ही रहा था कि 25 मार्च 2018 को चमियाला में अपने घर पर गिरने से सिर की चोट ने उसे फिर से बीमार कर दिया। प्रसिद्ध वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंस भी ऐसी ही बीमारी से ग्रसित थे। अस्पतालों की यात्रा फिर शुरू हो गई। महँगा इलाज और विदेश से दवाई मँगाने की मजबूरी के बावजूद भी देश-विदेश में अपने मित्रों-शुभचिन्तकों की मदद से त्रेपन के जीवन की जीवटता और जीवंतता कम नहीं हुई थी। कमजोरी की हालात में भी उसकी सामाजिक सक्रियता शिथिल नहीं हुई थी। समसामयिक मुद्दों पर सोशल मीडिया पर वह सक्रिय रहता था। अपने नये उपन्यास ‘ललावेद’ जो कि ‘यमुना’ और ‘हे ब्वारी !’ का अगला भाग है को कम्प्यूटर में टाइप करने वह व्यस्त रहता। उसकी जाबांजी देखिए कि हाथों ने टाइप करने में असमर्थता जाहिर की तो वो बोल के टाइप करने लगा और जब आवाज ने भी साथ देना छोड़ दिया तो आंखों की पलकों – पुतलियों के इशारे से अब कम्प्यूटर पर टाइप करने लगा था। यह उसकी जीने की दृड-इच्छाषक्ति का ही कमाल था कि जुलाई, 2019 को जब में उसके घर मिलने गया तो जाते वह कहने लगा कि “अरुण भाई, ‘तुमसे मिल कर मुझे जीने की नई ताकत मिली है। मैं अपने उपन्यास ‘ललावेद’ को जरूर पूरा करूंगा।“ तब मैंने उससे कहा, “मुझे तो तुमसे मिलकर जीने का जज्बा और सच्चा मकसद ही मिल गया है। बस तुम जल्दी से सेहदमंद हो जाओ।’’

हावर्ड फास्ट के नायक ‘स्पार्टाकस’ की तरह ही ‘उत्तराखंड का स्पार्टाकस’ त्रेपन सिंह चौहान के चेतना आंदोलन ने उसकी जीवनीय चेतना को कभी कमजोर नहीं होने दिया। जीवन के कठिन समय में अपनी पलकों में अनगिनत खुशहाली के सपने लिए समर्पित योद्धा का भाव लिए हुए वह दुनिया से विदा हुआ। त्रेपन की जीवनीय जीवटता को बनाये रखने के लिए धन्यवाद की पात्र उनकी धर्मपत्नी नीमा जी एवं बेटा अक्षत और बेटी परिधि हैं जो उसकी सेवा में दिन-रात तत्पर रहे। उसके मित्र विनोद बड़ोनी और शंकर  गोपाल कृष्णन जैसे मित्रों को सलाम कि उन्होने अपने मित्र त्रेपन का अंत तक साथ दिया।

इन्द्रेश मैखुरी ने त्रेपन सिंह चौहान पर अपने  श्रृद्धाजंलि लेख के अन्तिम अनुच्छेद में लिखा  है कि ‘‘ऋषिकेष के पूर्णानंद घाट पर अंतिम संस्कार करके लौटते हुए उनका बेटा अक्षत कई तरह से अपने पिता को याद कर रहा है। कई बार इस बच्चे की बात दिल को काटती हुई प्रतीत होती है। पिता द्वारा बीमारी के चलते वर्षों से झेले जा रहे कष्टों के बारे में जिक्र करते हुए 14 साल का अक्षत कहता है, “हमारे लिए तो अच्छा नहीं हुआ पर पापा के लिए अच्छा हो गया। जिस शरीर से वो इतनी तकलीफ में थे उससे आजाद हो गए।” ज़हीन बाप का सयाना बेटा! अपने पिता को याद करते हुए फिर अक्षत कह रहा है “पापा घाटा सहन कर लेते थे पर गलत काम नहीं करते थे। पापा ने मुझसे कहा कि कुछ और बनना, न बनना पर अच्छा आदमी जरूर बनना।“ यही बनना, बच्चे तू, जो तेरे पिता थे, जो तुझे बनने को तेरे पिता कह गए। यह तेरे पिता की आकांक्षा और दुनिया की जरूरत भी है।’’   

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