प्रो. डी.डी. पन्त – एक रहबर की याद

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अंतत: प्रो. डी.डी. पन्त एक बेहतर दुनिया का सपना देखते-देखते इस दुनिया से विदा हो गए। उन जैसे असाधारण जीवन, कर्म, भावनाओं और इरादों को अपनी मामूली कलम से उकेरने के दुस्साहस के बावजूद, हमारा यह प्रयास उनके सानिध्य सुख से उाण होने की एक बचकानी कोशिश भर है। हालांकि प्रो. पन्त को नजदीक से जानने-सुनने का मौका हमें उनके जीवन के उत्तरार्ध में ही मिल सका लेकिन हम बचपन से ही उनके किंवदतिंपूर्ण जीवन से परिचित थे। उत्तराखण्ड क्रांति दल के टिकट पर उन्होंने पृथक पर्वतीय राज्य के लिए लोकसभा का चुनाव लड़ा था। तब उनके मुद्दे की बजाय उनकी वैज्ञानिक छवि का कुछ ज्यादा प्रचार हुआ था। हमारे जैसे स्कूली छात्रों में भी उनके नाम की बड़ी चर्चा होती थी। अलबत्ता, उनकी संग-सोहबत में रहने और कुछ ‘सीख’ पाने के लिहाज से हमारे खाते में उनके जीवन का अंतिम एक-डेढ़ दशक ही आया। अब तक प्रो. पन्त वे सारी मंजिलें तय कर चुके थे, जिनके लिए उन्हें जाना जाता है।

भौतिक विज्ञान की दुनिया में वह स्पेक्ट्रोस्कोपी के दिग्गज थे। उन्होंने डीएसबी कालेज को उसके स्वर्णकाल में पहुंचाया और एक बेहद पिछड़े इलाके के नौजवानों को सफलता के आसमान में उड़ने का जज्बा व माहौल दिया। उनके छात्र दुनियाभर के नामी संस्थानों में पहुंचे और कई ने ऊंचे प्रशासनिक ओहदों पर भी झंडे गाड़े। वे उत्तर प्रदेश के शिक्षा निदेशक और कुमाऊं विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति भी रहे। इसके अलावा संयोगवश वे उक्रांद के संस्थापक अध्यक्ष भी बनाए गए। लेकिन उनके साथ हमारे रिश्तों के संदर्भ में इन सारी बातों का कोई खास महत्व नहीं है। नैनीताल के डीएसबी कैम्पस की फोटोफिजिक्स लैबोरेटरी में, जिसे प्रो. पन्त ने खुद तिनका-तिनका जोड़कर बनाया था, हम उनके शिष्यों की अंतिम पीढ़ी के थे। हमारे साथ उनके संबंध पिता-पुत्र जैसे औपचारिक व सीमित न होकर दादा-पोते जैसे खुले व दोस्ताना थे।

बीती सदी के आठवें-नवें दशक में, वह बतौर प्रोफेसर एमेरिटस लैब में पूरी तरह सक्रिय थे। नैनीताल में सर्दियों के दिन बेहद कष्टप्रद होते हैं। इन दिनों जब नियमित अध्यापक भी कॉलेज नहीं पहुंचने का बहाना खोजते थे, छरहरी काया के प्रो. पन्त सुबह साढ़े नौ बजे मल्लीताल मस्जिद के पास कॉलेज की तीखी चढ़ाई पर बिला नागा चढ़ते नजर आते। ये वही दिन थे जब फिजिक्स डिपार्टमेंट में प्रो. पन्त को किसी न किसी बहाने नीचा दिखाने की कोशिशें होती थीं। विभागाध्यक्ष के कमरे में लगी उनकी फोटो उखाड़ देंकी गई। लोग भूल गए कि प्रो. पन्त इस विभाग, संस्था और विश्वविद्यालय के सबसे सफल मुखिया रह चुके हैं। लैब में चल रहे प्रोजेक्ट से उन्हें बेहद मामूली मानद फैलोशिप मिलती थी। बाद के दौर में यह यूजीसी की रिसर्च स्कॉलरशिप से भी कम रह गई थी। लेकिन प्रो. पन्त के लिए ये बाते महत्वहीन थीं। शाम साढ़े चार बजे लैब से वापसी पर कभी वह गलती से विभाग के मुख्यद्वार की ओर बढ़ जाते और उसे बंद पाते तो मुस्करा कर कहते, “देखो, डिपार्टमेंट को बंद करने के मामले में ये लोग वक्त के बड़े पाबंद हैं।’’ और फिर लैब के पिछले दरवाजे से बाहर निकल जाते।

लैब के अपने छोटे से केबिन में उन्हें क्वांटम फिजिक्स की सद्य: प्रकाशित किसी लोकप्रिय पुस्तक में डूबे देखा जा सकता था। अकसर उनके सामने की सीट पर कोई न कोई जमा रहता। कभी सामने टंगे बोर्ड पर कोई शोध छात्र अपने ताजा एक्सपेरीमेंट के रिजल्ट समझा रहा होता तो वह कभी विज्ञान, राजनीति, साहित्य या किसी भी अन्य विषय पर गहन चर्चा में उलझे रहते। वह इकोलॉजी के बड़े मुरीद थे और क्वांटम मैकेनिक्स की कतिपय अवधारणाओं के साथ उसकी बड़ी दिलचस्प साम्यता खोज निकालते। यह जानना भी बड़ा दिलचस्प है कि विज्ञान के दर्शन ने प्रो. पन्त को गांधी और उनके विचारों का अनुयायी बनाया। गांधी की साद्गी को वह सेकेंड लॉ ऑफ थर्मोडायनमिक्स की मदद से सही ठहराते थे। जिन मूल्यों की वकालत करते, अपने जीवन में उन्हें पूरी तरह आत्मसात भी करते थे। सचमुच वह सच्चे गांधीवादी थे!

कुछ कर गुजरने का उत्साह उन्हें बूढ़ा नहीं होने देता और किसी नई पहल के लिए वह तत्काल उठ खड़े होते। विश्वविद्यालय या देश-दुनिया की किसी समस्या पर वह सिर्फ कोसने या वक्त काटने के लिए चर्चा नहीं करना चाहते थे, उनकी बात अकसर समस्या के निराकरण की पहल में खत्म होती वह उसका पूरा कार्यक्रम सामने रख देते। उनकी इस उत्साही प्रवृत्ति के कारण हम अकसर ऐसी चर्चाओं से कतराते थे। हम डरते थे कि कि कहीं प्रो. पन्त ऐसा कार्यक्रम न बना दें, जिसे अंजाम देना हमारे मनोबल के दायरे में न हो।

जीवन की राहों पर

यह वाकया उस जमाने का है, जब देश को आजादी मिली ही थी। हिमालय के दूर-दराज गांव के अत्यंत विपन्न परिवार में जन्मा एक छात्र नोबेल विजेता भौतिकशास्त्री सर चन्द्रशेखर वेंकट रमन की प्रयोगशाला (रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट, बेंगलूर) में अपना शोधकार्य समेट रहा था। घर की माली हालत अच्छी नहीं थी। रमन साहब ने उसे भारतीय मौसम विभाग की शानदार नौकरी का प्रस्ताव दिया। गांधी को अपना आदर्श मानने वाले के छात्र को गुरु का यह प्रस्ताव कुछ जंचा नहीं, ‘‘मैं आपकी तरह शिक्षक बनना चाहता हूं।’’ रमन साहब हंस पड़े, बोले, ‘‘तुम जीवन भर गरीब और उपेक्षित ही रहोगे।’’

रमन साहब की बात सही साबित हुई। हजारों छात्रों के लिए सफलता की राह तैयार करने वाले प्रो. देवी दत्त पन्त अपने जीवन की संध्या तक लगभग गुमनाम और उपेक्षित रहे। बीती सदी के पांचवें दशक में जब नैनीताल में डी़एस़बी़क कालेज की स्थापना हुई तो प्रो. पन्त भौतिकविज्ञान विभाग का अध्यक्ष पद संभालने आगरा कालेज से यहां पहुंचे। वह स्पेक्ट्रोस्कोपी के आदमी थे और सबसे पहले उन्होंने यहां फोटोफिजिक्स लैब की बुनियाद डाली। जाने-माने भौतिकशास्त्री और इप्टा (इंडियन फिजिक्स टीचर्स ऐसोसिएशन) के संस्थापक डी.पी. खण्डेलवाल उनके पहले शोधछात्र बने। उस जमाने में शोध को आर्थिक मदद देने वाली संस्थाएं नहीं थीं। दूसरे विश्वयुद्घ के टूटे-फूटे उपकरण कबाड़ियों के पास मिल जाया करते थे और पन्त साहब अपने मतलब के पुर्जे उनके पास जाकर जुटा लेते थे। कबाड़ के जुगाड़ से लैब का पहला टाइम डोमेन स्पेक्ट्रोमीटर तैयार हुआ। इस उपकरण की मदद से पन्त और खण्डेलवाल की जोड़ी ने अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण शोधकार्य किया। यूरेनियम के लवणों की स्पेक्ट्रोस्कोपी पर हुए इस शोध ने खासी धूम मचाई। इस विषय पर लिखी गई अब तक की सबसे चर्चित पुस्तक (फोटोकैमिस्ट्री ऑफ यूरेनाइल कंपाउंड्स, ले़ राबिनोविच एवं बैडफोर्ड) में पन्त और खण्डेलवाल के काम का दर्जनों बार उल्लेख हुआ है। शोध की चर्चा अफवाहों की शक्ल में वैज्ञानिक बिरादरी से बाहर पहुंची। आज भी जिक्र छिड़ने पर पुराने लोग बताने लगते हैं- प्रो. पन्त ने तब एक नई किरण की खोज की थी, जिसे ‘पन्त रे’ नाम दिया गया। इस मान्यता को युरेनियम लवणों पर उनके शोध का यह लोकप्रिय तर्जुमा कहना ठीक होगा।

कुछ समय बाद प्रो. पन्त डी.एस.बी. कालेज के प्रिंसिपल बना दिए गए। यह दौर इस कालेज का स्वर्णयुग कहा जाता है। न केवल कालेज के पठन-पाठन का स्तर नई ऊंचाइयों तक पहुंचा बल्कि प्रो. पन्त की पहल पर छात्रों के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अलग से कक्षाएं लगने लगीं। उत्तराखंड के बेहद पिछड़े पहाड़ी इलाके के लिए इस पहल का खास अर्थ था। उस जमाने में शहरों में पहुंचने वाले पहाड़ी नौजवान की पहली छवि अमूमन ईमानदार घरेलू नौकर की थी। पहाड़ की जवानी मैदान के ढाबों में बर्तन धोते या फिर सीमा पर पहरेदारी करते बीतती थी। ऊंची नौकरियों में इक्का-दुक्का भाग्यशाली पहुंच पाते थे। प्रो. पन्त के बनाए माहौल ने गरीब घरों के सैकड़ों छात्रों को देश-विदेश में नाम कमाने लायक बनाया। उस जमाने के जाने कितने छात्र आज भी अपनी सफलता का श्रेय देते हुए उन्हें श्रद्घापूर्वक याद करते हैं।

बाद में प्रो. पन्त उत्तर प्रदेश के शिक्षा निदेशक और कुमाऊं विश्वविद्यालय की स्थापना होने पर इसके पहले वाइस चांसलर बने। इस विश्वविद्यालय के साथ उन्होंने उनके सपने जुड़े थे। कुमाऊं व गढ़वाल विश्वविद्यालयों की स्थापना भारी राजनीतिक दबाव में एक साथ की गई थी। राज्य सरकार ने इन्हें खोलने की घोषणा तो कर दी लेकिन संसाधनों के नाम पर ठेंगा दिखा दिया। प्रो. पन्त इसे नामी-गिरामी विश्वविद्यालयों की कतार में लाना चाहते थे। इसलिए जब-जब कोई अपनी हैसियत की आड़ में विश्वविद्यालय को समेटने की कोशिश करता, वह पूरी ताकत से प्रतिरोध करते। तत्कालीन गवर्नर (और कुलाधिपति) एम. चेन्ना रेड्डी से प्रो. पन्त की ऐतिहासिक भिड़ंत को कौन भुला सकता है! चेन्ना रेड्डी अपने किसी खासमखास ज्योतिषी को मानद डाक्टरेट दिलवाना चाहते थे। प्रो. पन्त के कुलपति रहते यह कैसे संभव होता! वह अड़े और अंतत: जब बात बनती नजर नही आई तो इस्तीफा देकर बाहर निकल आए। प्रो. पन्त के इस्तीफे की भारी प्रतिक्रिया हुई। लोग सड़कों पर उतर आए और अंतत: गवर्नर को झुकना पड़ा। पन्त साहब ने वापस वीसी की कुर्सी संभाली।

प्रशासनिक जिम्मेदारियों से मुक्त होने के बाद प्रो. पन्त अपनी लैब में वापस लौट गए और रिसर्च में जुट गए। दूसरी प्रयोगशालाओं और शोध निर्देशकों से कई मायनों में प्रो. पन्त बिलकुल फर्क थे। लैब की नियमित बातचीत में नए शोधछात्रों के बचकाने तर्कों को भी वह बड़ी गंभीरता से सुनते और उनकी कमजोरियों को दूर करते। उनकी भारी-भरकम मेज के सामने लगे बोर्ड पर छात्र बारी-बारी से अपनी प्रॉब्लम पर चर्चा करते और अंत में प्रो. पन्त खुद उठकर बोर्ड के सामने पहुंच जाते। वैज्ञानिक दृष्टि के बुनियादी मूल्य कोरे भाषणों के बजाय उनके व्यवहार से छात्रों को मिलते थे। इन पंक्तियों के लेखकों में एक छात्र (प्रो. प्रेम बल्लभ बिष्ट, प्रोफेसर भौतिकी, आईआईटी मद्रास) के शोधपत्र में पेश किए गए किसी विश्लेषण से वह संतुष्ट नहीं हो पा रहे थे। काफी बहस-मुबाहिसे के बाद प्रो. पन्त ने बेहद विनम्रता से कहा, ‘‘तुम्हारी बात में दम है, हालांकि मैं इस विश्लेषण से संतुष्ट नहीं हूं। अब ऐसा करो, मेरा नाम इस लेखकों में शामिल करने के बजाय एकनॉलेजमेंट्स में डालकर पेपर छपने भेज दो।’’ खोखली प्रोफेसरी से छात्रों को दबाए रखने वाले और ठीकपने की व्याधि से ग्रस्त विश्वविद्यालयी अध्यापकों की भीड़ में प्रो. पन्त अलग चमकते थे। उन्होंने माइकल कासा और हर्जबर्ग जैसे दिग्गज नोबेल विजेताओं के साथ काम किया था। ये दोनों वैज्ञानिक प्रो. पन्त की प्रतिभा के जबर्दस्त मुरीद थे और कई वर्षों तक उन्हें अमेरिका आकर काम करने की सलाह देते रहे। कासा से उनकी गहरी दोस्ती थी। वह हर साल क्रिसमस के आसपास उनका पत्र प्रो. पन्त की टेबल पर रखा दिखाई देता।

अब तब अलग उत्तराखंड राज्य की मांग उठने लगी थी। प्रो. पन्त ‘स्मॉल इज ब्यूटीफुल’ के जबर्दस्त मुरीद थे। बड़े प्रदेश की सरकार के साथ उनके अनुभवों ने भी उन्हें छोटे राज्य की अहमियत से वाकिफ कराया और वह उत्तराखण्ड राज्य की मांग के मुखर समर्थक बन गए। इसलिए, जब अलग राज्य के लिए उत्तराखण्ड क्रांति दल के गठन का मौका आया, नेतृत्व के लिए एकमात्र प्रो. पन्त ही सर्वमान्य हुए। और इस तरह विज्ञान की सीधी-सच्ची राह से वह राजनीति की भूल-भुलैया में निकल आए। उन्होंने उक्रांद के टिकट पर अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ सीट से लोकसभा के लिए चुनाव लड़ा और जमानत जब्त करवाई। शायद पेशेवर घुन्ने नेताओं के सामने लोगों को सीधा-सरल वैज्ञानिक हजम नहीं हुआ। बाद में उक्रांद की अंदरूनी खींचतान और इसके नेताओं की बौनी महत्वाकांक्षाओं से उकता कर प्रो. पन्त ने राजनीति से किनारा कर लिया और एक बार फिर अपनी प्रयोगशाला में लौट आए।

जन्म और शुरुआती वर्ष

प्रो. पन्त का जन्म 1919 में आज के पिथौरागढ़ जिले के एक दूरस्थ गांव देवराड़ी में हुआ था। प्राथमिक शिक्षा गांव के स्कूल में हुई। पिता अम्बा दत्त वैद्यकी से गुजर-बसर करते थे। बालक देवी की कुशाग्र बुद्घि गांव में चर्चा का विषय बनी तो पिता के सपनों को भी पंख लगने लगे। किसी तरह पैसे का इंतजाम कर उन्होंने बेटे को कांडा के जूनियर हाईस्कूल और बाद में इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई के लिए अल्मोड़ा भेजा। अल्मोड़ा तक आजादी की लड़ाई की आंच पहुंच चुकी थी। देवी दत्त को नई आबोहवा से और आगे जाने की प्रेरणा मिली।

धर के माली हालात आगे पढ़ने की इजाजत नहीं देते थे। तभी पिता के एक मित्र बैतड़ी (सीमापार पश्चिमी नेपाल का एक जिला) के एक संपन्न परिवार की लड़की का रिश्ता लेकर आए। पिता-पुत्र दोनों को लगा कि शायद यह रिश्ता आगे की पढ़ाई का रास्ता खोल दे। इस तरह इंटरमीडिएट के परीक्षाफल का इंतजार कर रहे देवीदत्त पढ़ाई का रास्ता खुलने की आस में दांपत्य जीवन में बंध गए।

इंटरमीडिएट के बाद देवी दत्त ने बनारस हिन्दू युनिवर्सिटी में दाखिला लिया। यहां से उन्होंने भौतिकविज्ञान में मास्टर्स डिग्री पाई। ख्यातिनाम विभागाध्यक्ष प्रो. आसुंदी को इस प्रतिभाशाली गरीब छात्र से बेहद स्नेह था। देवी भी उन्हीं के निर्देशन में पीएच.डी. करना चाहते थे। प्रो. आसुंदी ने वजीफे के लिए तत्कालीन वाइस चांसलर डा. राधाकृष्णन से मिलने का सुझाव दिया। पन्त डा. राधाकृष्णन के पास अपनी अर्जी लेकर पहुंचे। बड़ा रोचक प्रसंग है। राधाकृष्णन स्पांडिलाइटिस के कारण आरामकुर्सी पर लेट हुए काम कर रहे थे। पन्त की अर्जी देकर उनका जायका बिगड़ गया। बोले- आसुंदी अपने हर छात्र को स्कॉलरशिप के लिए मेरे पास भेजे देते हैं। हमारे पास अब पैसा नहीं है। निराश देवी दत्त वापस लौट आए। आसुंदी ने उन्हें ढाढ़स बंधाया और बेंगलूर में रमन साहब के पास जाकर रिसर्च करने का निर्देश दिया। इस तरह द्योराड़ी का देवी दत्त महान वैज्ञानिक सर सी.वी. रमन का शिष्य बन गया। यद्यपि उनका पीएच़डी़ रजिस्ट्रेशन बीएचयू में प्रो. आसुंदी के साथ ही था। शोधकार्य पूरा होने पर देवी दत्त को डी.एससी. की उपाधि मिली। स्पेक्ट्रोस्कोपी में उनके योगदान के लिए उन्हें कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा गया। इनमें अमेरिका का प्रतिष्ठित सिगमा-साई अवार्ड, इंडियन एकेडमी ऑफ साइंस की फैलोशिप, रमन सेंटेनरी अवार्ड, आसुंदी सेंटेनरी अवार्ड आदि को गिना जा सकता है।

जीवन की सांझ

नैनाताल परिसर की फोटोफिजिक्स लैब एक तरह से प्रो. पन्त के नाम से देश की विज्ञान बिरादरी में जानी जाती है। प्रो. पन्त को इस लैब से बेहद प्यार था। फोटोफिजिक्स लैब प्रो. पन्त के लिए जीवनीशक्ति से कम नहीं थी। अपनी अधूरी आत्मकथा की भूमिका में उन्होंने लिखा है, ‘‘मेरी आकांक्षा मृत्युपर्यन्त काम में लगे रहने की है। परिस्थितियों के घेरे में सम्भवत: लैब में आता ही रहूंगा। जमीन से तेल ड्रिल करने वाली कम्पनियां कहती हैं यदि तेल निकलना बंद हो जाय तो बोर करना बन्द कर दें। इस नियम का यथासंभव पालन मैं करना चाहूंगा। पर तेल न निकलता हो तो भी बोर तो चलाना ही पड़ेगा, इस आशा में कि शायद कुछ निकले ही।’’ लेकिन नियती को कुछ और मंजूर था। रहस्यमय परिस्थितियों में एक दिन फिजिक्स डिपार्टमेंट का पूरा भवन आग की भेंट चढ़ गया। संभवत: यह फोटोफिजिक्स लैब के अवसान की भी शुरुआत थी। कई वर्षों तक अस्थाई भवन में लैब का अस्तित्व बनाए रखने की कोशिश की गई। बाद में फिजिक्स डिपार्टमेंट के भवन का पुनर्निर्माण हुआ तो फोटोफिजिक्स लैब को भी अपनी पुरानी जगह मिल गई। लेकिन अब इसका निश्चेत शरीर ही बाकी था, आत्मा तो शायद आग के साथ भस्मीभूत हो गई। प्रो. पन्त का स्वास्थ्य भी अब पहले जैसा नहीं रहा। वह नैनीताल छोड़ हल्द्वानी रहने लगे। इस लैब ने कई ख्यातनाम वैज्ञानिक दिए और कुमाऊं जैसे गुमनाम विश्वविद्यालय की इस साधनहीन प्रयोगशाला ने फोटोफिजिक्स के दिग्गजों के बीच अपनी खास जगह बनाई।

जिस किसी को प्रो. पन्त के साथ काम करने का सौभाग्य मिला, वह उनकी बच्चों जैसी निश्छलता, उनकी बुद्घिमत्ता, ईमानदारी से सनी उनकी खुद्दारी और प्रेम का मुरीद हुए बिना नहीं रहा। निराशा जैसे उनके स्वभाव में थी ही नहीं। चाहे वह रिसर्च का काम हो या फिर कोई सामाजिक सरोकार, प्रो. पन्त पहल लेने को उतावले हो जाते थे। अपने छात्रों को वह अक्सर उनके चुप बैठे रहने पर लताड़ते और सामाजिक सरोकारों के लिए आवाज उठाने को कहते। गांधी के विचारों को उनकी जुबान ही नहीं, जीवन में भी पैठे हुए देखा जा सकता है। जो कहते वही करते और ढोंग के लिए वहां कोई जगह नहीं थी। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि अगर आप अपने विचारों पर दृढ़ रहें तो हताशा, निराशा और दु:ख मुश्किल से मुश्किल हालात में भी आपको नहीं घेरेंगे।

11 जून 2008 को प्रो. पन्त इस दुनिया से विदा हो गए। अंतिम समय उनमें जिजीविषा की पहले जैसी ज्वाला धधकती रही। हमारा समाज उनका ऋणी है। गांधी के रास्ते पर चलने वाले प्रो. पन्त का इकोलॉजी में गहरा विश्वास था। वह अक्सर दोहराते थे कि कुदरत मुफ्त में कुछ नहीं देती और हर सुविधा की कीमत चुकानी पड़ती है। अपने जीवन में उन्हें बहुत कम सुविधाएं इस्तेमाल कीं लेकिन बदले में उन्होंने उनकी जरूरत से ज्यादा कीमत चुकाई।

(प्रो. पन्त के निधन पर उन्हें श्रद्धांजलि स्वरूप लिखे गए इस आलेख के कुछ अंश प्रो. प्रेमबल्लभ बिष्ट के संस्मरणों से लिए गए हैं.)

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