कुमाऊं और गढ़वाल के पड़ोसी इलाके-मेरठ, मुरादाबाद, बरेली, बदायूं 1857 के पहले स्वतंत्रता आंदोलन का केंद्र रहे। विद्रोहियों के हौसलों ने ईस्ट इंडिया कंपनी के कारकूनों को इन इलाकों को छोड़ने पर मजबूर कर दिया। सैकड़ों की संख्या में यूरोपीय महिलाएं, बच्चे, अफसर, जवान, मिशनरी अपनी जान बचाने के लिए इन इलाकों से नैनीताल भाग आए थे। खतरा बढ़ने पर इनमें से कुछ ने अल्मोड़ा में भी शरण ली।
गदर के दौरान हेनरी रैम्जे कुमाऊं के कमिश्नर थे। गदर को लेकर उन्होंने 22 जुलाय, 1858 नार्थ वेस्ट प्राविंस की सरकार को लेकर एक विस्तृत पत्र भेजा। उनका यह पत्र हालांकि, गदर को देखने का उनका अपना नजरिया हो सकता है। लेकिन उन्होंने पत्र में बताया है कि, गदर की लपटें उन्होंने पहाड़ तक पहुंचने से कैसे रोकी और कौन कौन लोग इस काम में उनके मददगार बने। पेश है- उत्तर पश्चिमी प्रांत के सचिव विलियम म्यूर को भेजा गया रैम्जे के पत्र की इबारत-
प्रेषकः हेनरी रैमजे, कमिश्नर, कुमाऊं
सेवा में,
विलियम म्यूर, सचिव, सरकार, उत्तर-पश्चिमी प्रांत
दिनांकः नैनीताल, 22 जुलाई 1858।

महोदय,
आपकी ओर से दिनांक 30 अप्रैल को मांगी गई रिपोर्ट प्रस्तुत की जा रही है।
2. मेरठ के विद्रोह की खबर मुझे, 22 मई को उस समय मिली, जब मैं गढ़वाल के दूरस्थ पहाड़ी इलाके में था। मैं तुरंत अल्मोड़ा लौटा। कर्नल मैकाउसलैंड के साथ जो भी व्यवस्थाएँ उचित लगीं कीं। फिर पहाड़ों की तलहटी (तराई-भाबर) में शांति व्यवस्था बनाए रखने, पैसा जुटाने और रसद का इंतजाम करने के लिए नैनीताल की ओर रवाना हुआ।
3. पैसे के लिए मेरी ओर से भेजे गए आवेदन बरेली और मुरादाबाद बहुत देर से पहुँचे, क्योंकि सिपाहियों ने कोषागार कब्जे में ले लिए थे। अतः उनसे अधिक धनराशि नहीं निकाली जा सकी। बहेड़ी तहसील के अधिकारियों ने भी स्वयं ही धन ले लिया था, और मुझे कुछ नहीं मिला। रुद्रपुर में बड़ी संख्या में एकत्र हुए बंजारों ने रास्ते बंद कर दिए थे, जिससे सारा व्यापार ठप हो गया। मैंने भाबर में जितना अनाज हो सका, एकत्र किया और आने वाले घटनाक्रम का इंतजार किया।
4. एक जून को बरेली के शरणार्थी (यूरोपीय) हल्द्वानी पहुँचे, और मुरादाबाद के जो शरणार्थी नैनीताल आ रहे थे, वे 4 जून को कालाढुंगी पहुँचे। सार्जेंट स्टेपल्स को छोड़कर, जो बरेली से चला था, सभी सुरक्षित पहाड़ों तक पहुँच गए। 6 जून से लगभग एक माह तक हम मैदानी क्षेत्र से पूरी तरह कटे रहे। जुलाई के आरंभ में मसूरी से पहाड़ों के रास्ते एक डाक-लाइन स्थापित की गई।
5. 10 जून के कुछ बाद, मैदानी क्षेत्र में अराजकता फैल गई। रामपुर तथा मुरादाबाद जिले से डाकुओं (विद्रोही) के बड़े-बड़े झुंड कोटा भाबर के गाँवों में घुस आए और लूटपाट की। वे हजारों मन अनाज ले गए, और जितना संभव था नुकसान पहुँचाया। उस समय पूरे भाबर की रक्षा के लिए हमारे पास पर्याप्त सैनिक नहीं थे, इसलिए मैंने अपने प्रयास हल्द्वानी के आसपास छखाता क्षेत्र तक सीमित रखे। कुछ झड़पों, जिनमें लगभग 20 विद्रोही मारे गए, भाबर के पहाड़ी किसान वापस पहाड़ों को लौट गए। मैं कोई प्रभावी प्रतिरोध नहीं कर सका, और कुछ ही दिनों में विद्रोहियों ने गाँवों को लूट लिया, जिससे वह क्षेत्र वीरान हो गया।
6. 27 जून को विद्रोही फिर से ऊपरी कोटा के नीचे एकत्र हुए। मैंने धन सिंह के नेतृत्व में एक दल उस स्थान की रक्षा के लिए भेजा, लेकिन रामपुर क्षेत्र के मस्तू खान, भारी संख्या में घुड़सवार और पैदल सेना लेकर आ पहुँचे। धन सिंह और कुछ अन्य लोग मारे गए। तहसील में जमा थोड़े से रुपये (लगभग 400) लूट लिए गए और विद्रोही गाँवों को नष्ट किए बिना तुरंत पीछे हट गए।
7. जून के आसपास, विशेषकर मैदान की सीमा पर रहने वाले पहाड़ी लोगों में से कुछ दुष्ट प्रवृत्ति के लोग यह अनुभव करने लगे कि हम कमजोर हैं। चूँकि मेरे पास कोई जिला पुलिस नहीं थी, मुझे व्यवस्था बनाए रखने के लिए कठोर उपाय अपनाने की आवश्यकता महसूस हुई। मुझे यह आशंका थी कि यदि प्रांत का कोई भी भाग अव्यवस्थित हो गया, तो नैनीताल में हमारी स्थिति अत्यंत संकटपूर्ण हो जाएगी। यदि एक परगना में भी अव्यवस्था फैली तो अन्य भी इसकी देखादेखी करते।
8. यह संकट देखकर मैंने कुमाऊं में मार्शल लॉ (सैन्य कानून) घोषित कर दिया। डकैती (विद्रोह) के पहले कुछ मामलों में मैंने लंबे कारावास की सजा दी। यह कारगर नहीं हुआ तो और भी लंबी सजाएँ दीं। फिर भी सफलता नहीं मिली। अंततः मैंने कुछ डाकुओं (विद्रोहियों) को मृत्युदंड दिया। यह बात पूरे प्रांत में फैला दी गई। इससे विद्रोही डर गए। शांतिप्रिय लोगों को सुरक्षा महसूस हुई, और इलाका शांत बना रहा।
9. रोहिलखंड के शरणार्थियों के आने के बाद यह स्पष्ट हो गया कि तत्काल सहायता की कोई संभावना नहीं है। हमारे पास पैसा बहुत कम था, और हमें किसी सहायता की उम्मीद भी नहीं थी। कॉल्विन और मैंने भत्तों की एक सूची तैयार की, जिसके अनुसार हम हर यूरोपीय को मासिक भुगतान करते थे।
10. रामपुर के नवाब ने अपने राज्य में व्यवस्था बनाए रखने और हमारी सहायता करने के लिए अपनी पूरी शक्ति लगाई। परंतु जो जानकारी हमें मिली, उससे यह संभावना प्रतीत हुई कि, जुलाई के अंत में बकरीद के अवसर पर रामपुर में अशांति फैल सकती है। यदि नवाब मारे जाते, तो विद्रोही तुरंत हम पर आक्रमण कर देते। अनेक महिलाओं और बच्चों की उपस्थिति, हमें आक्रमण की स्थिति में काफी बाधा पहुँचाती। यद्यपि यह संभावना मात्र थी। मैंने एक अपमानजनक हार की संभावना के बजाय पीछे हटना उचित समझा। ऐसे में मैंने लगभग 200 महिलाओं और बच्चों को अल्मोड़ा भेज दिया। जब ईद बीत गई तो वे सभी नैनीताल लौट आए। यह एकमात्र अवसर था जब किसी को नैनीताल छोड़ना पड़ा।
11. मैदान के पुलिस और सशस्त्र सैनिक 9 सितंबर को भाग गए। केवल पहाड़ी सशस्त्र सैनिक ही यहां रह गए। लेकिन हल्द्वानी और उसके निकट के पुलिस थाने 17 सितंबर को उस समय तक बने रहे, जब तक 1,000 घुड़सवार और पैदल सैनिकों वाले विद्रोहियों ने उन स्थानों पर कब्जा नहीं कर लिया। 18 तारीख को, कैप्टन मैक्सवेल ने गोरखों के एक दल और लगभग 40 घुड़सवारों, जिनमें अधिकारी और 8 अनियमित सैनिक शामिल थे, के साथ विद्रोहियों को पराजित कर दिया। लगभग 150 विद्रोही मारे गए। सितंबर के आरंभ तक 66वीं गोरखा रेजिमेंट और 5वीं अनियमित घुड़सवार सेना, हल्द्वानी की रक्षा करती रही। लेकिन बरसात रुकने के बाद आबोहवा इतनी खतरनाक हो गई कि, मैंने इतने मूल्यवान सैनिकों की जान जोखिम में डालना उचित नहीं समझा और उन्हें वापस बुला लिया।
12. इसके बाद पुलिस पहाड़ के प्रवेश द्वार तक हट गई और हल्द्वानी के निचले क्षेत्र में गश्त जारी रखी गई। 6 अक्तूबर को विद्रोहियों ने, जिनकी संख्या लगभग 5,000 थी, फिर से हल्द्वानी पर कब्जा कर लिया। उन पर आक्रमण करना उचित नहीं समझा गया लेकिन उनकी घुड़सवार सेना की एक टुकड़ी को पकड़ने का प्रयास किया गया। यद्यपि हम टुकड़ी को पकड़ने में असफल रहे, फिर भी हमने एक ऐसा अलार्म बजाया कि, विद्रोही आक्रमण की आशंका से रात में भाग खड़े हुए। वे अपना अनाज तथा कुछ अन्य सामान छोड़ गए। एक विद्रोही सिपाही अगली सुबह पकड़ा गया और उसे फाँसी दी गई।
13. अस्वास्थ्यकर मौसम बीत चुका था। चूँकि हमें रोहिलखंड में सेना के प्रवेश की खबर मिलने की उम्मीद थी, मैंने कर्नल मैकाउसलैंड को हल्द्वानी में स्थिति संभालने को कहा, ताकि विद्रोहियों से निपटा जा सके या कम-से-कम उनकी राह में बाधा डाली जा सके। नेपाल से सेना की टुकड़ी पहुंचने और अन्य स्थितियों ने हमें नैनीताल में रामपुर की ओर के दर्रों की रक्षा के लिए प्र्याप्त सैनिकों का इंतजाम करने में सक्षम बनाया।
14. एक जनवरी को विद्रोहियों ने हमारे शिविर के लिए आ रही अनाज की खेप को रोकने के लिए रुद्रपुर से रात में कूच किया और सुबह 9 बजे हल्द्वानी आ पहुँचे। कैप्टन बॉ के नेतृत्व वाली सेना ने उन्हें पराजित किया, जिसमें लगभग 50 बागी मारे गए।
15. भंडार में रसद खत्म हो जाने और अनाज प्राप्त करने की स्थितियां संभव नहीं होने के कारण कैप्टन क्रॉसमैन की घुड़सवार सेना को काशीपुर भेज दिया गया था। 1 फरवरी तक हमारे पास लगभग 1,000 पैदल सैनिक, 250 घुड़सवार, दो 6-पाउंडर तोपें और दो पर्वतीय तोपें (बिना पहियों वाली तोपें) थीं।
’16. फज्ल हक की 4,500 सैनिकों और चार तोपों वाली सेना पूर्व से आगे बढ़ी, और काला खान 4,000 सैनिकों तथा चार तोपों के साथ बहेड़ी से आगे बढ़ा। फज्ल हक की सेना ने हल्द्वानी से 13 मील पूर्व में, डेरा डाला, और काला खान की सेना ने हल्द्वानी से 16 मील दक्षिण में मोर्चा बनाया। उन्होंने हम पर सामने और पीछे दोनों ओर से आक्रमण की योजना बनाई। परंत स्थानीय भूगोल हमारे इतना अनुकूल था कि, हम शांत बने रहे। इसके बाद उन्होंने मिलकर आक्रमण करने का निश्चय किया। लेकिन यह संभव नहीं था। 10 फरवरी को कर्नल मैकाउसलैंड ने काला खान की सेना पर आक्रमण कर दिया। इस युद्ध के बाद विद्रोहियों का साहस टूट गया, और वे तराई के परगनों में फिर लौटकर नहीं आए।
17. एक बार उनका दल किलपुरी में राजस्व वसूलने आया और सितारगंज तहसील में ठहरा। कैप्टन बॉ को तुरंत 250 पैदल और घुड़सवार सैनिकों के साथ भेजा गया। श्री कार्माइकल, जिनके पास पहले इन परगनों का प्रभार था, नागरिक अधिकारी के रूप में इस दल के साथ गए, और सूझबूझ भरी रणनीति से विद्रोहियों को घेरकर खत्म कर दिया गया।
18. जनवरी में यह पता चला कि, काली कुमाऊं के कुछ लोग, विद्रोहियों के साथ शामिल हो गए हैं। मैंने कॉल्विन को वहां भेजा। कॉल्विन ने उनके मनसूबे ध्वस्त कर दिए। हमने दर्रों की इतनी मुस्तैद चैकसी की कि, विद्रोहियों ने कभी बरमदेव (टनकपुर) की दिशा में पहाड़ों की ओर बढ़ने का प्रयास नहीं किया।
19. जब जून में अल्मोड़ा की तोपखाना कंपनी में असंतोष के लक्षण दिखे, तो उनमें से इतने लोगों को जेल में डाल दिया गया कि, जेल में जगह ही नहीं बची। इस दौरान नैनीताल के स्थानीय लोगों में इतना भय व्याप्त था कि कुली मिलना कठिन हो गया। मैंने जेल से 40 खूंखार कैदियों को रिहा कर दिया। उनकी बेड़ियाँ खुलवाईं और बिना किसी पहरे के कुली के रूप में काम पर लगाया। उनसे यह वादा किया गया कि, उन्होंने काम ईमानदारी से किया तो साल के अंत में उन्हें रिहा कर दिया जाएगा। उन्होंने सड़कों पर काम किया। बोझ ढोया। एक मौके पर तो उन्होंने कालाढूंगी के पास विद्रोहियों के एक दल पर आक्रमण कर कई को मार डाला। अतः मैंने वर्ष के अंत में उन्हें रिहा कर दिया। मैंने यह उचित समझा कि श्री कॉल्विन अल्मोड़ा में ही बने रहें। वहां उनकी उपस्थिति ने नगरवासियों में हमें लेकर भरोसा बनाए रखा।
20. श्री बेकेट ने बिजनौर से पहाड़ों की ओर जाने वाले दर्रों की अच्छी रखवाली की, और जहाँ भी आक्रमण की आशंका हुई, तुरंत उस दिशा में बढ़े। श्रीनगर में कुछ मैदानी लोगों द्वारा गड़बड़ी उत्पन्न करने के प्रयास के कारण, अल्मोड़ा से गोरखों की एक कंपनी कुछ समय के लिए भेजी गई। लेकिन विद्रोह के आरंभ में कुछ घटनाओं को छोड़कर, बेकेट का इलाका (गढ़वाल) कुमाऊं की तरह वफादार और शांत बना रहा। कुछ व्यक्तिगत अपवादों के साथ, कुमाऊं और गढ़वाल के लोगों ने बहुत अच्छा आचरण किया। उन्होंने रास्तों की रक्षा के लिए कुली, अनाज और सैनिक उपलब्ध कराए। उनकी वफादारी तथा ईमानदारी का सबसे अच्छा प्रमाण यह है कि 10 से 50,000 रुपये तक की धनराशि, मसूरी से अल्मोड़ा तक पहाड़ों से होते हुए मुट्ठी भर लोगों की सुरक्षा में भेजी गई।
21. श्री बैटन को मैंने नैनीताल में रोके रखा, क्योंकि यह अनिश्चित था कि मुझे कब कहाँ जाना पड़े। स्टेशन में व्यवस्था बनाए रखने तथा चारों ओर से आने वाले अनगिनत अनुरोधों का बिना विलंब सावधानीपूर्वक निपटारा करने के लिए एक नागरिक अधिकारी की उपस्थिति नैनीताल में नितांत जरूरी थी।
22. श्री अलेक्जेंडर ने रामपुर के नवाब से अनुरोध करके स्वर्ण मोहरों में 64,000 रुपये प्राप्त किए। उन्हें राजस्व के भुगतान में लगभग एक लाख रुपये प्राप्त हुए, और मुरादाबाद में हुंडियाँ से भी धन प्राप्त हुआ। गढ़वाल के राजा ने एक लाख रुपये उधार दिए, जिससे हमने उस समय तक अपना खर्च चलाया, जब तक कि, स्थतियां सामान्य होने पर देहरा (देहरादून) के रास्ते हमें पैसा नहीं भेजा गया।

23. मैं यह उल्लेख करना उचित समझता हूँ कि मैंने स्वर्गीय लेफ्टिनेंट गवर्नर के उस आदेश को रद्द करना अपना कर्तव्य समझा, जिसमें सभी ग्रामीणों को अपने पशु घरों से बाहर रखने का निर्देश दिया गया था। इससे बड़ा असंतोष उत्पन्न हुआ। यह पहाड़ी लोगों को इतना आपत्तिजनक लगा कि मैंने इसे रद्द करने की जिम्मेदारी स्वयं ली। मैंने स्वर्गीय श्री कॉल्विन को परिस्थितियाँ समझाते हुए लिखा, और उन्होंने मेरी कार्यवाही का अनुमोदन किया। मुझे कोई औपचारिक स्वीकृति नहीं मिली, परंतु यह (कासिद द्वारा) श्री थॉर्नहिल, तत्कालीन सचिव, सरकार के एक पत्र में मुझे बताई गई। मैंने इस विषय का उल्लेख इसलिए किया है ताकि ऐसा प्रतीत न हो कि मैंने स्वर्गीय लेफ्टिनेंट गवर्नर के आदेशों में हस्तक्षेप करके अनादरपूर्ण व्यवहार किया।
24. अंत में, मैं यह कहना चाहूँगा कि परिपत्र में जिन अन्य तथ्यों की रिपोर्ट माँगी गई थी, उनका इस प्रांत में कोई संबंध नहीं है। परंतु मैंने विद्रोह की दुखद खबर सबसे पहले कुमाऊं पहुँचने से लेकर, हल्द्वानी में सेना के हाथों विद्रोहियों की पराजय तक, जिस तिथि के बाद से हमें किसी ने तंग नहीं किया, घटित घटनाओं का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया है।
आपका अत्यंत आज्ञाकारी सेवक,
एच. रैमजे,
कमिश्नर।



