आदमखोर बाघ ने सात महीने में ले ली थी पच्चीस लोगों की जान
असिस्टेंट कंजरवेटर ई.ए. स्माईथिस ने किया नरभक्षी का खात्मा
आज से 115 साल पहले यानि 1911-12 में एक आदमखोर बाघ ने नैनीताल में 25 लोगों की जान ले ली। नगर के दस मील के दायरे में इस बाघ ने एक के बाद एक घटनाओं को अंजाम दिया। अंततः एक असिस्टेंट कंजरवेटर ई.ए. स्माईथिस [1] ने रातीघाट के पास एक इस आदमखोर का खात्मा किया। यह नरभक्षी आठ फीट से ज्यादा लंबा था। स्माईथिस ने इंडियन फॉरेस्टर के मई, 1913 के अंक में नरभक्षी के आतंक और इसके अंत का रोचक विवरण दिया है। पेश है स्माईथिस की शिकार कथा
मैनईटर इन हिमालया के मुख्य अंश
यह बहुत कम होता है कि बाघ हिमालय में काफी ऊपर तक चले जाएँ। यह तो और भी दुर्लभ है कि वे नैनीताल जैसे लोकप्रिय स्थान के आसपास डेरा डाल लें। लेकिन सितंबर 1911 में एक बाघ ने नैनीताल के आसपास के जंगलों में डेरा डाल लिया। नैनीताल में आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ था। आठ महीने में इस आदमखोर ने 25 लोगों को अपना शिकार बना डाला।
नरभक्षी का विचरण क्षेत्र नैनीताल को केंद्र मानकर लगभग दस मील की त्रिज्या में फैला हुआ था। यह क्षेत्र सामान्यतः घने जंगलों से आच्छादित है। मैदानों के साल के जंगल से लेकर ऊँचाई पर सदाबहार बाँज के वनों तक यह चट्टानी इलाका है। नैनीताल और रानीखेत की सड़कों के अलावा, यह क्षेत्र अनेक व्यस्त पगडंडियों और गाँवों से भरा हुआ है। नगर की जरूरतों के लिए आसपास के जंगलों से ईंधन, घास, लकड़ी, कोयला, चूना आदि का बड़े पैमाने पर दोहन होता है। इस कार्य के लिए बड़ी संख्या में मजदूर जंगलों में फैले होते थे।
आदखोर ने सितंबर 1911 में नैनी ताल से दस मील उत्तर-पूर्व में एक ग्रामीण का पहला शिकार किया। इसके बाद वह दो महीने के लिए अपने क्षेत्र के दक्षिण-पश्चिम की ओर चला गया और उस दौरान वहां चार-पाँच लोगों की जान ले ली।

इसके बाद नैनीताल के पास किलबरी में उसने एक लकड़हारे को मार डाला। इस दौरान वह एक युवा सैन्य अधिकारी की तीन गोलियों से बाल बाल बच गया। अधिकारी ने उसे किलबरी वन विश्राम गृह के पास एक घुरड़ का पीछा करते हुए देखा था। इसके बाद फिर वह फतेहपुर पट्टी की तरफ चला गया। जनवरी, 1912 की शुरुआत में उसने ताबड़तोड़ घटनाओं को अंजाम देना शुरू कर दिया। दो से तेरह जनवरी के बीच ग्यारह दिनों में उसने नौ लोगों की जान ले ली। इस घटनाओं के बाद सरकार ने उसके सिर पर 500 रुपये का इनाम घोषित कर दिया। इसके बाद वह कुछ समय तक भाबर के जंगलों में बेरोकटोक घूमता रहा।
25 फरवरी को उसने अचानक नैनीताल के उत्तर-पूर्व में अपने पुराने क्षेत्र में फिर से अपनी गतिविधियाँ शुरू कर दीं। मैं उस समय दो मित्रों के साथ रानीखेत मार्ग पर रातीघाट विश्राम गृह में था। हम दोपहर में सामने की खाई में घुरड़ पर निशाना साधने का खेल खेल रहे थे कि एक घबराया हुआ ग्रामीण आया और बताया कि, कुछ ही देर पहले बाघ ने उसके गाँव से लगभग दो मील दूर एक महिला को मार दिया है। हम जल्दी से राइफलें, खाने-पीने का सामान और एक लालटेन उठाकर घटनास्थल की ओर चल दिए। दो मील रास्ता, बढ़ते बढ़ते पाँच मील का हो गया। जब हम वहाँ पहुँचे तो लगभग अंधेरा हो चुका था। घटनास्थल एक गहरी खाई था। इसके एक तरफ जंगल और दूसरी ओर गेहूं के सीढ़ीदार खेत थे। उस रात ऐसी जगह बाघ और उसके शिकार को ढूँढना व्यर्थ होता, इसलिए हम लौट आए और अगले दिन के लिए-घेरा डालने की योजना बनाई।
घेरा डालने के दौरान वह मजदूरों की कतार तोड़कर निकल गया। मौके से महिला का अधखाया शव उस बेचारे पति को सौंपा, जिसका दुःख देखकर मन भर आया।
इसके अगले ही दिन उसने किलबरी वन विश्राम गृह से सात मील दूर गाँव में एक और महिला को मार डाला। इस शिकार के दौरान वह पेड़ पर भी चढ़ गया जो कि, आश्चर्यजनक था। मौके पर महिला का शव एक बुरांश के पेड़ पर रख दिया गया था। दूसरी रात वह पेड़ पर चढ़कर महिला के शव को उठाकर ले गया।
इसके बाद वह उस इलाके में दस दिन और रहा, लेकिन कोई शिकार नहीं किया। 11 मार्च को जब हम किलबरी पहुँचे तो विश्राम गृह के आसपास उसके ताजे पंजों के निशान मिले। ये उसके जाने के निशान थे। मैंने हर दिशा में भैंस के बछड़े बाँधे और दिनभर जंगल में उसके निशान ढूँढता रहा, पर कोई सफलता नहीं मिली। पूरे एक महीने तक उसने किसी इंसान को नहीं मारा।
मार्च के अंत में वह फिर प्रकट हुआ और एक लड़की को मार डाला। एक ग्रामीण ने पुरानी बंदूक से उस पर गोली चलाई, जिससे वह गंभीर रूप से घायल तो नहीं हुआ, पर चोट लगी।
उसका अगला और अंतिम शिकार 18 अप्रैल को कुछ विचित्र परिस्थितियों में हुआ। मैं उस समय अल्मोड़ा में था जब तार आया कि, मैं भवाली में अपने वन संरक्षक ओस्मास्टन से मिलूँ। 19 मार्च को दोपहर लगभग दो बजे भवाली पहुँचा और पता चला कि एक दिन पहले लगभग पाँच मील दूर बाघ ने शिकार किया था और ओस्मास्टन वहाँ जाने की तैयारी में थे। चूँकि मेरे पास न बंदूक थी न राइफल, इसलिए ओस्मास्टन ने मुझे अपनी बंदूक और तीन कारतूस दिए और हम चल पड़े।
जब हम वहाँ पहुँचे तो कम से कम पचास ग्रामीण, एक पटवारी और कई वन रक्षक उस जंगल में इधर-उधर बिखरे थे जहाँ शव पड़ा था। यह स्पष्ट था कि बाघ अपने शिकार के पास नहीं रुका था। शव हमें एक नाले की तलहटी में रानीखेत मार्ग से मात्र सौ गज की दूरी पर मिला। शव की दशा भयावह थी। बाघ ने स्पष्टतः उसे अपने पंजों और नाखूनों से मारा था। मुँह से नहीं, जैसा कि, बाघों का सामान्य तरीका होता है। कंधों और पीठ पर पंजों के गहरे निशान थे। एक पैर गायब था और दूसरे का आधा हिस्सा और दोनों हाथ। हमने झाड़ियां साफ कर मचान मँगवाया।
ओस्मास्टन ने कहा, उन्हें रातभर बैठने की इच्छा नहीं है इसलिए मचान पर मैं बैठूं। मचान को एक पेड़ पर लगाया गया। रात अँधेरी थी, चाँद नहीं था, और उस भीड़ और होहल्ले के कारण बाघ के जल्दी लौटने की उम्मीद नहीं थी, इसलिए ओस्मास्टन ने लालटेन जरूरी बताई। वह शव के पास एक पत्थर पर इस तरह रखी गई कि, उसकी रोशनी मुझ पर न पड़े। शाम सात बजे जब मैं मचान पर चढ़ा तो अँधेरा छाने लगा था। ओस्मास्टन और मजदूर चले गए थे।
उनके जाने के पाँच मिनट भी नहीं बीते थे कि मुझे सूखे पत्तों पर सरसराहट की आवाज सुनाई दी, जो नाले की तरफ से आ रही थी। मेरा दम फूलने लगा। लेकिन मेरी शंका झूठी निकली। ये दो तीतर थे, जो नाले के ऊपर एक पेड़ पर रात बिताने के लिए बैठ गए।
जैसे-जैसे उजाला कम होता गया, लालटेन की रोशनी के घेरे में शव और साफ दिखने लगा। आधे घंटे बाद मैं फिर तीव्र उत्तेजना के सारे अनुभवों से गुजरा। इस बार कोई संदेह नहीं था कि, खड़ी ढलान से कोई बड़ा जानवर नीचे आ रहा था। लेकिन अँधेरे में कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। बाघ ने मुझे नहीं देखा और नाले में तब तक उतरता-फिसलता चला गया जब तक कि वह मेरे मचान के ठीक नीचे नहीं आ गया।
लालटेन की रोशनी के घेरे को छोड़कर सब कुछ घुप्प अँधेरे में था। जब बाघ ने रोशनी देखी तो वह रुककर बैठ गया। फिर मैंने उसे सतर्कता से आगे बढ़ते देखा। शायद पाँच मिनट बाद मैंने देखा कि, उसका सिर रोशनी के घेरे में आधा मेरी ओर मुड़ा था। फिर वह पूरी तरह रोशनी में आ गया और अपने शिकार के ऊपर खड़ा हो गया।
उसे इस तरह अपनी रेंज में देखकर मैं अचानक शांत हो गया। मैंने बंदूक उठाई और निशाना साधकर गोली चला दी। बारूद की चमक से एक पल के लिए आँखें चुँधिया गईं, और जब दिखाई देने लगा तो वह गायब था। न कोई दहाड़ न गुर्राहट, न घुटन की आवाज और न भागने की कोई आहट। मैं पूरी तरह चकराया गया और कंबल ओढ़कर सोने की तैयारी करने लगा।
इसी बीच ओस्मास्टन, गोली की आवाज सुनकर, अपने पेड़ से उतरे और मेरे पेड़ के पास आ पहुँचे। वे पूछ रहे थे, क्या हुआ। मैंने ठीक-ठीक बताया। ओस्मास्टन की राय थी कि, बाघ बच निकला। अन्यथा वह यहीं मरा पड़ होता। उन्होंने टॉर्च से शव के आसपास का पूरा इलाका छान मारा, पर कुछ नहीं मिला। उन्होंने तय किया कि मचान से उतरकर घर लौट चलते हैं।
अगली सुबह हम फिर उस जगह के लिए निकल रहे थे, तभी एक उत्तेजित ग्रामीण खबर लेकर आया कि, बाघ मर गया।
वहाँ पहुँचने पर हमने देखा कि, एक ओर ग्रामीणों की भीड़ शव के चारों ओर विलाप कर रही थी, और लगभग आठ फीट दूर, दूसरी भीड़ बाघ के शव के चारों ओर जश्न मना रही थी। लोगों में झुककर हमारे पैर छूने की होड़ लग गई। वे हमें मुक्तिदाता कहने लगे।
गोली ने बाघ की गर्दन की रीढ़ तोड़ दी थी। लगता है गोली लगते ही उसने एक छलाँग लगाई और गिरते ही मर गया। वह एक घास के ढेर के पीछे पड़ा था। इसीलिए पिछली रात हमउ से देख नहीं सके।
बाघ एक वृद्ध नर था, 8 फीट 9 इंच लंबा। उसका मुँह और जबड़े असाधारण थे। जांच से स्पष्ट हो गया कि, वह नरभक्षी क्यों बना और लोगों को पंजों से क्यों मारता था। उसका दाहिना जबड़ा पहले लगी किसी की गोली से टूट गया था, जिससे दोनों नुकीले दाँत टूट गए थे। बाईं ओर के नुकीले दाँत भी खराब हो गए थे। केवल बाईं ओर की दाढ़ काम की थीं। छाती में एक ताजा जख्म भी था।
ओस्मास्टन ने उसके पेट की जाँच की, उसमें एक दर्जन इंसानी हाथ और पैर की उँगलियों के नाखून थे। बाघ के शव को रानीखेत मार्ग से भवाली लाया गया। इस तरह नैनीताल के नरभक्षी का अंत हुआ। सात महीने उसने जिले को आतंकित किया। पच्चीस लोगों की जान ली। कई गाँव उजड़ गए। वनों से सबंधित काम बंद हो गए और पगडंडियों पर आवाजाही बंद हो गई थी।
[1] एवेलिन आर्थर स्माइथीज़ (1885–1975) एक प्रतिष्ठित वन अधिकारी (फॉरेस्टर) और डाक-टिकट विशेषज्ञ (फिलैटेलिस्ट) थे। उनका जन्म 19 मार्च 1885 को देहरादून, भारत में ब्रिटिश माता-पिता के यहाँ हुआ था। स्माइथीज़ ने 1908 से 1940 तक इंडियन फॉरेस्ट सर्विस (Indian Forest Service) में सेवा दी और मुख्यतः नैनीताल में कार्यरत रहे। बाद में वे 1940 से 1947 तक नेपाल के मुख्य वन संरक्षक (Chief Conservator of Forests) रहे। उन्हें उत्तराखंड और नेपाल की वन पारिस्थितिकी का गहरा ज्ञान था।
वानिकी के साथ-साथ वे डाक-टिकटों के अध्ययन के भी प्रसिद्ध विशेषज्ञ थे। भारत, जम्मू-कश्मीर, नेपाल और कनाडा के प्रारंभिक डाक-टिकटों पर उनके शोध और पुस्तकों को आज भी फिलैटेली के क्षेत्र में महत्वपूर्ण संदर्भ माना जाता है।
चित्र : AI द्वारा निर्मित है, इसका मूल लेख से कोई संबंध नही है
मूल लेख : Smythies, E. A. (1913). A Man- Eater in the Himalyas. Indian Forester, 39(5), 233–239



