वनाग्नि से धधकता उत्तराखंड

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जंगल में आग लगी है कौन बुझाए…
पानी में आग लगी है कौन बुझाए…

हिमालय को एशिया का वाटर टैंक या वाटर टावर कहा जाता है। इस वाटर टावर के मध्य हिस्से अर्थात उत्तराखंड हिमालय के जंगल मार्च महीने से निरंतर भीषण आग की चपेट में आकर धधक रहे हैं।

अरुणाचल के बाद उत्तराखंड के जंगल भारत में सर्वाधिक कार्बन संरक्षण करते हैं। लेकिन हर साल जंगलों में लगने वाली आग से, इस संरक्षित कार्बन का एक हिस्सा तत्काल ही वापस उत्सर्जित हो जाता है। साल दर साल जंगलों में आग की घटनाएं चिंताजनक होती जा रही हैं। इसका घातक असर तात्कालिक भी होता है और दूरगामी भी। जीव जंतु, कीट पतंगे जल मरते हैं। जल संकट बढ़ता है और पारिस्थितिकी का संकट भी बढ़ जाता है।

जंगलों का जलना सिर्फ पेड़ों का जलना नहीं होता। पेड़ों के साथ कुछ इंसान और उनके पालतू पशु भी हर साल जंगलों की आग में जल मरते हैं। यूँ तो जंगलों की आग उत्तराखंड के सभी पहाड़ी जिलों में धधक रही है लेकिन इस बार टिहरी जिले के सकलाना रेंज की भीषण आग ने और भी व्यथित किया है। चिंता बढ़ाई है। इसी रेंज में चिपको आंदोलन का एक गाँव खुरेत और वृक्ष मानव विशेश्वर दत्त सकलानी का रोपा और पाला पोषा सकलाना का जंगल भी स्थित है। दोनों जंगलों को आग से भारी क्षति पहुँची है। खुरेत गांव में 1979 में चिपको आंदोलन चला था जिसमें जंगलों की सुरक्षा के साथ ही पानी भी एक विषय था।

सकलाना का जंगल वृक्ष मानव विश्वेश्वर दत्त सकलानी ने 1950 के दशक में रोपना शुरू किया था। यूँ तो इन क्षेत्रों में पहले भी आग लगती रही है लेकिन इतनी व्यापक और भीषण पहले कभी नहीं लगी। पिछले 15 -20 सालों की मीडिया रिपोर्ट्स देखें, तो साल दर साल उत्तराखंड के जंगलों की जलने जलने की घटनाएँ बढ़ रही हैं।

जब उत्तराखंड उत्तर प्रदेश राज्य का हिस्सा था हालांकि जंगल तब भी जलते थे लेकिन दुखद बात यह है कि राज्य बनने के बाद भी जंगलों का जलना एक प्रमुख मुद्दा न बन सका। 1985 में यूएनडीपी की सहायता से उत्तराखंड के जंगलों को आग से बचाने के लिए 500 करोड़ रुपए की एक योजना शुरू की गई थी। योजना में एक हेलीकॉप्टर सहित अनेक उपकरण खरीदे गए थे लेकिन 1990 में ही यह योजना बंद कर दी गई।

2015 में उत्तराखंड के लिए एक जलवायु परिवर्तन एक्शन प्लान भारत सरकार ने स्वीकृत किया था। हिमालय बचाने के नाम पर कुल 8832 करोड रुपए का प्रावधान किया गया था। जंगलों में आग की घटनाओं पर अंकुश लगाना, मिट्टी पानी का संरक्षण करना, जल स्रोतों को बचाना आदि इस एक्शन प्लान के उद्देश्य थे। शुरू में 5 साल के लिए योजना बनी थी बजट प्रावधान केंद्र और राज्य सरकार ने संयुक्त रूप से करना था। प्रोजेक्ट का क्या हुआ, अब किसी को कुछ पता नहीं।

2016 में उत्तराखंड के जंगलों में भीषण आग लगी थी, तब हिमालय सेवा संघ की एक नागरिक रिपोर्ट बताती है कि लगभग 2100 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र आग की चपेट में आया था। इस नागरिक रिपोर्ट में अनेक संस्तुतियों हैं। उसी दौरान राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन बल, एनडीआरएफ ने जंगलों में आग के कारण और बचाव पर एक जांच रिपोर्ट बनाई थी। लेकिन इस रिपोर्ट का भी कहीं अता पता नहीं है।

2017 में ग्लोबल फॉरेस्ट्री एक्शन प्लान बनाने की भी बात हुई। जिसमें एक देहरादून चार्टर भी शामिल किया गया था। वन अनुसंधान संस्थान देहरादून में 40 देशों के विशेषज्ञ जुटे थे लेकिन आगे की कवायद क्या हुई, अब किसी को जानकारी नहीं।

स्थानीय समुदाय जंगलों से कटते जा रहे हैं। पलायन के कारण लोग जंगलों से और भी विमुख होते चले गए और यह धारणा बन गई कि जंगल तो सरकार का है। जब जंगलों में आग लगती है तो लोग आसमान की तरफ देखते हैं कि पानी बरसे तो जंगल की आग बुझे। हालांकि आग बुझाने के दौरान हर वर्ष नागरिकों की मौत होती रही हैं। वन कर्मी भी चपेट में आते रहे हैं। लेकिन ठोस प्रबंध योजना नहीं बनाई जाती।

राज्य की सरकार और राजनीतिक दल के एजेंडों में यह कोई मुद्दा भी नहीं बन पाया। चीड़ को कोसना आसान हो गया है। लेकिन इस बार तो मिश्रित वन भी जगह-जगह जले हैं। इससे कुछ सबक सीखा जाएगा, कह नहीं सकते।

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