मंगलेश दा हैं कहीं हमारे आस-पास

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कुछ मित्रों के दिवंगत होने पर लगता रहा है कि जैसे हम भी अब नहीं रहे। फिर भावनाओं से बाहर आकर सोचते हैं कि नहीं हम अभी जिन्दा हैं। हाँ, हमारा एक अनोखा हिस्सा मर गया है। फिर सोच की कौंध आगे बढ़ती है कि अरे वह गया हुआ आदमी तुममें और कितने ही औरों में जीवित है। जो रच गया है, उसमें जीवित है। फिर भी मुस्कान नहीं लौटती पर साहस लौटता है। और हम उस गये दोस्त और अपने को साथ-साथ जीवित रहने की कोशिश करते हैं।

हाल के दशक में केशव अनुरागी, गिर्दा, वीरेन डंगवाल, शमशेर बिष्ट, नईमा खान उप्रेती, कबूतरी देवी, जीत सिंह नेगी या पुरुषोत्तम असनोड़ा आदि कितने ही सुपरिचितों-मित्रों के जाने पर ऐसा ही लगता रहा था। फिर समझदारी हमें अपनी जगह ले आती रही। भाई, ज्यादा भावुक मत बनो। गये हुये को उलट-पलट कर देखो। वह अभी भी तुम्हारे समाज के काम आयेगा और आता रहेगा। वह हमारे आसपास ही है और रहेगा। काफल और पानी आज भी पहाड़ के प्राकृतिक आधार हैं और रहेंगे।

मंगलेश दा के जाने पर पीड़ा ज्यादा ही गहरी और चुभन भरी महसूस हुई। पता नहीं, मैं किस रिश्ते से मंगलेश दा के बारे में सोचता हूँ? अपने कवि के पाठक/श्रोता की हैसियत से या दा के भाई के रूप में या एक गड़बड़ाये जा रहे समाज और देश के एक सह नागरिक के रूप में? तार्किकता और आनन्द से आगे एक कवि अपने मित्रों को रुला क्यों जाता है, जबकि उसकी कविता हमारे बीच ही होती है। बहुत दिनों बाद इतनी बेचैनी हुई। मंगलेश दा के जाने के बाद के घण्टों में जिस को भी फोन किया, उसे रोता हुआ पाया। राजेश जोशी सिसकते हुये बात नहीं कर पा रहा था। अभी हाल में भाई के जाने पर वह अपने को नियंत्रित रख सका था। अशोक पाण्डे अपना रोना छिपाने की नाकाम कोशिश कर रहा था। प्रभाती नौटियाल की चुप्पी ही बहुत कुछ कह रही थी। असद जैदी का पहला वाक्य था ‘साहिब तो चले गये हैं।’

फिर उनका अपने को फोन पर नियंत्रित किये रहना मैं महसूस करता रहा। राजीव लोचन साह तो यही कहते रहे कि एक-एक कर सब साथी जा रहे हैं। चन्दन डांगी और प्रकाश उपाध्याय चुप हो जा रहे थे और ऐसे ही पंकज बिष्ट भी। चुप्पी शायद शोक की गहनतम आवाज है। और भी बहुत मित्रों को- खासकर जगूड़ी, ज्ञानरंजन, सुषमा नैथानी (मंगलेश दा के अस्पताल भर्ती होते ही उसका फोन आया था), सुन्दर ठाकुर, इब्बाररब्बी आदि से- फोन करना चाहता था। फिर लगा क्यों सता रहा हूँ सबको।

रात के लगभग ग्यारह बजे मैंने साहस करके अल्मा का नम्बर घुमा दिया और फोन तुरन्त उठा। मंगलेश दा की बेटी ने साहस और स्पष्टता से बात की। घर से अस्पताल जाने, और अस्पताल से आसमान का तारा बन जाने तक की अपने बब्बा की कहानी उसने सार रूप में बताई। माँ और भाई के हाल बताये। उसके बोलने में एक छिपा हुआ रोना था जो बार-बार प्रकट हो जा रहा था। अगले कुछ घण्टों में मंगलेश दा की कविताओं और तरह-तरह के लेखन को पढ़ रहा था और अनगिनत मुलाकातों और बात-बहसों को याद कर रहा था, जो हमारे बीच पिछले 45 सालों में हुई थी।

अगस्त 2017 में वे हमारे पास नैनीताल में थे। दर्शनघर में जब कोहरे के बीच उनकी कविता रिकार्ड कर रहे थे तो 2 कबूतर रैलिंग में बैठने आ गये थे, कुछ गौरेया पास में थीं और झील के हमारे पास के कोने में मछलियाँ उमड़ आई थी। हम सभी आश्चर्यचकित थे कि ये हो क्या रहा है। जाने से पहले उन्होंने अगले साल तुंगनाथ साथ चलने का वादा ले लिया था। यात्राओं से आमतौर पर भागने वाला मंगलेश दा यात्रा की फरमाईश कैसे कर गया! बताने लगे कि तुमने ही नहीं, कमल जोशी ने भी मुझे वहाँ जरूर जाने को कहा था।

टिहरी में कवियों की एक पीढ़ी बीसवीं सदी की शुरूआत से खिलती हुई बड़ी होने लगी थी। इनमें आत्माराम गैरोला, सत्यशरण रतूड़ी, तारादत्त गैरोला, चन्द्रमोहन रतूड़ी आदि के नाम याद आते हैं। एक और पीढ़ी टिहरी रियासत के अवसान के समय जन्म ले रही थी। श्रीदेव सुमन (वे स्वयं भी कवि थे) की शहादत से कुछ सप्ताह पहले लीलाधर जगूड़ी जन्म ले रहे थे। देश के आजाद और विभाजित होने से दस दिन पहले वीरेन डंगवाल का आगमन हो रहा था। टिहरी के भारत में विलय से कुछेक माह पहले मंगलेश डबराल ने काफलपानी में पहली किलकारी भरी थी। मंगलेश, वीरेन और जगूड़ी ये तीन हिन्दी की बड़ी हस्तियाँ बने। तीनों देश और देशान्तर में पहाड़ और हिमालय के प्रतिनिध् बने। अपनी पीढ़ी के लाखों लोगों की तरह ये तीनों प्रवास में रहे।

जगूड़ी देहरादून तक वापस लौट पाये, वीरेन बरेली तक और मंगलेश दिल्ली में जमे रहे पर तीनों कभी पहाड़ से अलग नहीं हुये। मंगलेश दा ने तो अपनी कविता में कहीं लिखा था कि ‘उनका दिमाग जैसे पहाड़ में रह गया हो’ या कि ‘पहाड़ जैसे उनके दिमाग में रह गया हो’। मंगलेश दा की जर्मनी के आइस्लिगेन नामक शहर के चौराहे पर काँच में खुदी यह कविता कवि के (और लाखों औरों के) शहर में फंस जाने की त्रासदी को उजागर करती हैः

‘मैंने शहर को देखा और मैं मुस्कुराया
वहाँ कोई कैसे रह सकता है
यह जानने मैं गया
और वापस नहीं आया।’

वीरेन डंगवाल का दूसरा घर नैनीताल था, जहाँ आने के बहाने ढूँढना उसका प्रिय शगल था। कभी भी प्रकट हो सकता था और अनेक बार घोषणा के बावजूद नहीं पहुँचता था। जिस बरेली में उसने घर भी बनाया था, उसे वह अन्त तक ‘कैम्प आफिस’ कहता रहा। इन तीनों कवियों में पहाड़ों की गूँज और अनुगूँज कोई भी महसूस कर सकता है।

स्थानीय स्पर्श के लिहाज से पीछे से सुमित्रानन्दन पन्त, चन्द्र कुँवर या शमशेर बहादुर सिंह खड़े दिख सकते हैं या हिन्दी की बड़ी दुनिया के निराला, मुक्तिबोध्, नागार्जुन या रघुवीर सहाय का ताप भी उन्हें मिलता रहा हो या ऐसे ही सुकान्त, माइकोवस्की, नाजिम हिकमत या नेरुदा का। पर इन तीनों की काव्य प्रतिभा कुछ अलग तरह की थी। तीनों एक सी मिट्टी-पानी से अंकुरित होकर भी अलग तरह का मुहावरा गढ़ते रहे। जगूड़ी नौकरी के अलावा पूरे कवि रहे हैं। कम नहीं रचा उन्होंने। अभी लगातार रचनारत हैं। वीरेन और मंगलेश प्रयोगशील पत्राकार, सौन्दर्यबोध् से भरे सम्पादक और अनुवादक भी रहे। साथ और अलग-अलग भी। पर मंगलेश एक अर्थ में इन दोनों से अलग हो जाते थे जब वे ज्यादा स्पष्ट बोलने लगते।

रचनाकारों के संगठन में पद स्वीकार कर लेते, नागरिक प्रतिरोधों में शामिल होते रहते और फेसबुक की दीवार में चुभने वाले शब्दों में अपनी बात लिख देते। अस्पष्टता और तटस्थता से उन्हें इन्कार है। यों कभी कभार वीरेन भी अनिच्छा से कुछ चीजें स्वीकार कर लेते थे। मंगलेश नागरिक- बुद्धिजीवी के रूप में क्रुद्ध और नुकीले हो सकते हैं पर कविता में उनका तरीका अपनी पुरानी शैली और संस्कार के आसपास रहा। हालांकि सत्ता की निर्ममता और अमानवीयता का तीखा विरोध् वे लगातार करते रहे। इधर के सालों में कुछ ज्यादा। आपातकाल के समय वे ‘प्रतिपक्ष’ से जुड़े थे, अंतिम सालों में पूरी तरह आजाद थे।

मंगलेश की प्रतिभा के कम से कम चार असरदार आयाम हैं। पत्राकार, सम्पादक, कवि-लेखक और स्वायत्त नागरिक- बुद्धिजीवी। पत्राकारिता से निकला हुआ उनका विशद लेखन अभी संकलित होना है। सम्पादक के रूप में ‘प्रतिपक्ष’, ‘हिन्दी पैट्रियट’, ‘पूर्वग्रह’, ‘आसपास’, ‘अमृत प्रभात’, ‘जनसत्ता’, ‘शुक्रवार’, ‘पासटाइम’ आदि को निखारने में उनकी भूमिका के साथ नये रचनाकारों को तैयार करना आदि पक्ष भी देखे जाने चाहिये। ‘जनसत्ता’ में वे दो दशक से अधिक समय तक रहे। यह भी याद रहे कि उनकी शुरूआती रचनायें ‘युगवाणी’ में प्रकाशित हुईं थीं। हर पत्र को निखारने में उनका योगदान रहा और वे उस टीम के सदस्य रहे, जो उक्त पत्रों को निकाल रही थी। कितने ही और प्रकाशनों और पत्र-पत्रिकाओं को उनका दुर्लभ परामर्श मिला। ‘पहाड़’ के वे गुमनाम सहयोगी रहे। ‘पहाड़’ के पहले अंक (1983) के आवरण हेतु वालेरा वावलोव के जिस चित्र पर आधारित रेखांकन विश्वम्भरनाथ शाह ‘सखा’ ने बनाया, उसे मंगलेश दा ने ही उपलब्ध कराया। ‘पहाड़’ के अध्यायों के आरम्भ में कविताओं को देना उन्हें रघुवीर सहाय तथा बाबा नागार्जुन की तरह बहुत भाया था। मंगलेश दा हर अंक हेतु कवितायें सुझाते और भेजते थे।

कवि के रूप में वे ‘पहाड़ पर लालटेन’ (1981) जला कर हिन्दी कविता के हाइवे में आये। 2020 में ‘स्मृति एक दूसरा समय है’ से पहले ‘घर का रास्ता’, ‘हम जो देखते हैं’, ‘आवाज भी एक जगह है’ तथा ‘नये युग में शत्रु’ जैसे कविता संग्रह आये। एक संग्रह अभी प्रेस में है और ‘मंगलेश समग्र’ भी। कवि के रूप में वे अनेक बार पुरस्कृत हो चुके हैं। इनमें साहित्य अकादमी पुरस्कार भी है, जिसे उन्होंने बाद में वापस कर दिया था। कवि के रूप में वे देश-विदेश में आमंत्रित किये जाते रहे। दर्जनों भाषाओं में उनकी कविताओं का अनुवाद तथा पाठ हुआ है और हो रहा है।

गद्य और यात्रा गद्य में उनकी एक और ही बानगी पाठकों को मिलती रही है। ‘लेखक की रोटी’ और ‘कवि का अकेलापन’ उनकी गद्य कृतियाँ हैं। ‘एक बार आयोवा’ तथा ‘एक सड़क एक जगह’ उनकी यात्रा पुस्तकें हैं। उनका गद्य अलग किस्म का, आत्मीय और सुगठित है। कंजूसी से ही सही वे सब कुछ कह जाते हैं। उनकी साहित्य, कला, संगीत और फिल्म समीक्षायें संकलित होना चाहती हैं। मंगलेश दा का राजनैतिक लेखन अपनी जगह पर है।

अनुवादक के रूप में उनको अनदेखा नहीं किया जाना चाहिये। हेरमन हेस्से के उपन्यास ‘सिद्दार्थ’ और अरुंधती राय के उपन्यास ‘द मिनिस्ट्री आव अटमोस्ट हैप्पीनैस’ के हिन्दी अनुवाद के आलावा नेरूदा, ब्रेश्ट, कार्देनाल आदि विख्यात कवियों को वे हिन्दी पाठकों के सामने लाये।

संगीत, चित्रकला, मूर्तिकला, फिल्मों और लोक कलाओं में भी उनकी गहरी रुचि थी। इन सब पर उन्होंने बहुत डूबकर लिखा है। कुछ मित्रों ने उनको आलाप लेते हुये सुना होगा। वे अपने हकलाने का बार बार जिक्र करते हैं पर मैंने उनको गाते या कविता पाठ के समय हकलाता हुआ नहीं पाया। दरअसल जिसे हकलाना होता है वह लिखने में ही हकलाता है। उनकी कुछ कवितायें कवियों तथा गीत-संगीत या लोक की हस्तियों पर हैं। ली पाइ (चीनी कवि), मुत्तिफबोध्, ब्रेश्ट, निराला जैसे कवियों, केशव अनुरागी जैसे लोकगायक, बिस्मिल्ला खान जैसे शहनाई वादक, अमीर खां जैसे संगीतकार, भीमसेन जोशी (राग दुर्गा) जैसे गायक, गुणानन्द पथिक जैसे योद्धा, बर्गीज कुरियन (मदर डेरी के बहाने) जैसे दूरदर्शी तथा जन समर्पित प्रबन्धक, कमल जोशी जैसे फोटोकार पर उनकी कवितायें बहुत प्रभावशाली हैं। जैसे वे कुछ व्यक्तियों के माध्यम से मनुष्यता के लिये जरूरी आधारों की चर्चा कर जाते हों। उनकी सृजनशीलता में देश और दुनिया को बेहतर बनाने के तरीके खोज रहे हों। चन्द्र कुँवर पर कविता तो नहीं पर एक धड़कता हुआ निबन्ध ‘कवि का अकेलापन’ उन्होंने लिखा। उन्हें चन्द्र कुँवर की कविता ‘अपने उद्गम को लौट रही अब बहना छोड़ नदी मेरी…’ बहुत पसन्द थी, हालांकि उन्होंने खुद मृत्यु पर कोई कविता लिखी हो मुझे याद नहीं आ रहा। यों एक कविता उन्होंने हिटलर पर भी लिखी । मैंने इस कविता को ‘डोलोमाइट गद्य’ कहा तो मंगलेश दा मुस्कुराये थे। अग्रज पीढ़ी के जगूड़ी, वीरेन, मंगलेश के साथ नेत्र सिंह रावत, मोहन थपलियाल, असद जैदी, इब्बार रब्बी, त्रिनेत्र जोशी, पंकज बिष्ट, मृणाल पाण्डे और इनसे कुछ सीनियर और स्थापित मनोहर श्याम जोशी, हिमांशु जोशी, गंगा प्रसाद विमल आदि हमारी पीढ़ी को प्रेरित प्रभावित करते रहे थे। पहाड़ों में हमारे पास घनश्याम शैलानी, गिर्दा, नरेन्द्र नेगी और विद्यासागर नौटियाल आदि थे, जिनमें हम अपनी आवाज को प्रकट और तेज होती हुई सुनते थे। उक्त नामों में से दस रचनाकार तो चले ही गये हैं।

अन्त में एक और याद। अक्टूबर 2008 में स्टीव एल्टर ने मसूरी के वुडस्टौक स्कूल में आयोजित ‘मसूरी पर्वत उत्सव’ में एक नया प्रयोग किया। अंग्रेजी में लिखने वालों को ही बुलाने वाले इस उत्सव ने उस बार जगूड़ी, वीरेन डंगवाल, गिर्दा, ओम प्रकाश वाल्मीकि, मंगलेश डबराल और नरेन्द्र नेगी को एक विशेष सत्र के लिये बुलाया। यह एक ताजगी भरा अनुभव था। 2 दिन हम साथ रहे। बीमारी के कारण गिर्दा और वीरेन दा नहीं आ पाये थे। कुछ माह पहले मैं 2007 की कालिन्दीखाल यात्रा से सुरक्षित लौटा था। मंगलेश दा बहुत देर तक अंगवाल डाले रहे। बोले, “शेखर तुम हमारे लिये अपने को बचा ले आये।“ मैंने कहा कि अनूप साह और प्रदीप पाण्डे जैसे सहयात्रियों  और राणा जैसे गाइड के रहते मृत्यु मुझे दबोच नहीं सकती थी। यों उस ऊँचाई पर मरना मामूली बात नहीं होती। तब मंगलेश दा ने ‘कवि का अकेलापन’ की प्रति मुझे दी। किताब के पहले पन्ने पर लिखा था ‘हम लाये हैं (बर्फ के) तूफान से कश्ती निकाल के। प्रिय शेखर पाठक के लिये और भी शुभकामनाएँ।’

मगर हम लोग मंगलेश दा को कोरोना के तूफान से जीवित निकालकर नहीं ला सके।

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