हिमालय से हिमाकत का नतीजा हैं हिमनद झीलों का खतरा

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विकास की बेलगाम दौड़ हिमालय के अस्तित्व के सामने निरंतर नई चुनौतियां खड़ी कर रही है। वन विनाश और पहाड़ों के अंधाधुंघ कटान के कारण बाढ़, भूस्खलन और अतिवृष्टि जैसी घटनाएं पहले की अपेक्षा कई गुना बढ़ गई हैं। बढ़ते मानव हस्तक्षेप के नतीजे भूमंडलीय तापमान में बढ़ोतरी के रूप में सामने आ रहे हैं। तापमान वृद्धि के कारण ग्लेशियरों की बर्फ पिघलने से हजारों हिमनद झीलें जन्म ले चुकी हैं। इन झीलों की संख्या और आकार दोनों में इजाफा हो रहा है। ये झीलें, निचले इलाकों के लिए कितनी खतरनाक हैं, इसे पिछले साढ़े दस साल के दौरान आयी केदारनाथ, जोशीमठ के तपोवन और सिक्किम में तीस्ता नदी की विनाशकारी बाढ़ से समझा जा सकता है। खुद भारत सरकार ने हिमालय में 188 ऐसी झीलें चिन्हित की हैं, जो निचले इलाकों में कभी भी भारी तबाही का कारण बन सकती हैं। 

इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलेपमेंट (इसीमॉड), काठमांडू की एक रिपोर्ट के मुताबिक पूरे हिन्दुकुश हिमालय की पांच प्रमुख नदी घाटियों में 25,614 बड़ी हिमनद झीलें हैं। जबकि, नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर ने भारतीय हिमालय में 28,043 छोटी-बड़ी हिमनद झीलें चिन्हित की हैं। हालांकि, इनमें से ज्यादातर झीलें बहत छोटी हैं। भारत सरकार के आपदा प्रबंधन डिवीजन ने हाल ही में  हिमालयी राज्यों के मुख्य सचिवों के साथ एक ऑनलाइन बैठक उल्लेख किया है कि भारतीय हिमालय में 188 हिमनद झीलों का आकार लगातार बढ़ रहा है।  इन हिमनद झीलों का ट्रीटमेंट करने के लिए टीमें बना दी गई हैं। खतरे वाली एसी झीलों में से 13 उत्तराखंड में स्थित हैं। सभी 13 झीलों को इनके रिस्क फैक्टर के आधार पर ए, बी और सी श्रेणी में बांटा गया है। बैठक में यह भी कहा गया कि,उत्तराखंड की इन तेरह में से पांच हिमनद झीलें सबसे ज्यादा खतरे की जद में हैं। इसलिए इन झीलों के ट्रीटमेंट के लिए एनआईएच रुड़की, जीएसआई लखनऊ, आईआईआरएस देहरादून, यूएसडीएमए और यूएलएमएमसी के विशेषज्ञों की टीम बनाई गई है। यह टीम दो हिमनद झीलों पर काम करेंगी। तीन अन्य ए श्रेणी की झीलों के लिए सीडैक पुणे, वाडिया इंस्टीट्यूट देहरादून, आईआईआरएस देहरादून, यूएसडीएमए, यूएलएमएमसी के विशेषज्ञों की टीम बनाई गई हैं। यही नहीं झीलों के अध्ययन के लिए सीडेक पुणे को लीड टेक्निकल एजेंसी बनाया गया है।

हिमनद झीलों  के खतरे को भांपते हुए सरकार ने ऐसी झीलों के ट्रीटमेंट के निर्देश संबंधित राज्य सरकारों को दिए हैं। हालांकि इन झीलों की जद में आने वाली संबंधित नदी घाटियों और इलाकों में टनल, बांध, फोरलेन हाइवे, बेतरबतीब शहरीकरण को रोकने या हिमालय की पास्थितिकी के अनरूप निर्माण की तकनीक अपनाने की दिशा में कोई कदम सरकार ने नहीं उठाया है। वह संभवतया यह चाहती है कि झीलों को फटने से पहले तोड़ दिया जाए। यद्यपि ऐसा करके कुछ समय के लिए खतरा जरूर टाला जा सकता है लेकिन जिस गति से  यह झीलें अस्थित्व में आ रही हैं, भविष्य में खतरा विकराल होता जाएगा। 

उत्तराखंड में ए श्रेणी में शामिल पांच खतरनाक झीलें

झील का नामबेसिन क्षेत्रवर्ग किमी 
वसुधारा तालचमोली0.50
अनाम झीलपिथौरागढ़, दारमा 0.9
अनाम झील, पिथौरागढ़पिथौरागढ़, लसर यांग्ती0.11
अनाम झील, पिथौरागढ़पिथौरागढ़, कुटी यांग्ती वैली0.04
युंगरूपिथौरागढ़, दारमा0.02

नदी घाटियों में स्थित बी श्रेणी की चार संवेदनशील झीलें

झील का नामबेसिन क्षेत्रवर्ग किमी
चमोलीविष्णुगंगा0.03
टिहरीभिलंगना 0.23
पिथौरागढ़गोरीगंगा  0.20
पिथौरागढ़कुटी यांग्ती वैली0.02

सी श्रेणी की चार संवेदनशील झीलें

झील का नामबेसिन क्षेत्रवर्ग किमी
अज्ञात झीलगंगा  17.90
अज्ञात झीलगंगा  5.60
केदारताल गंगा  12.10
देवीकुंड  गंगा 0.40

यह उल्लेखनीय है कि बीते साढ़े दस सालों में उच्च हिमालय में बनी तीन झीलों ने निचली घाटियों में भारी तबाही मचाई । 2013 में केदारनाथ में चोराबाड़ी हिमनद झील के टूटने से 4200 से ज्यादा लोग मारे गए। इसीतरह  सात फरवरी 2021 में चमोली जिले की ऋषिगंगा घाटी में हिमस्खलन से बनी झील पर एक हैंगिंग ग्लेशियर गिरने के परिणामस्वरूप आयी बाढ़ में 225 से ज्यादा लोग बह गए या जिंदा दफ्न हो गए और एनटीपीसी की निर्माणाधीन बिजली परियोजना तहस नहस हो गई। चार अक्तूबर, 2023 को सिक्किम में तीस्ता नदी के शीर्ष पर स्थित ल्होनक झील से फटने से कई सैन्यकर्मियों समेत दो सौ से ज्यादा लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। तीस्ता में आई इस अभूतपूर्व बाढ़ से 1200 मेगावाट बिजली क्षमता का 60 मीटर उंचा चुंगथांग बांध भी जमींदोज हो गया। भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु के वैज्ञानिकों का कहना है कि, ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालय में 1990 से अब तक ऐसी झीलों की संख्या में 50 फीसदी का इजाफा हो चुका है। 

उत्तरकाशी जिले की भागीरथी घाटी में इस तरह बन रही हिमनद झीलें। 

कैसे बनती है हिमनद झील 

नेशनल स्नो एंड आइस डाटा सेंटर की एक रिपोर्ट के मुताबिक हिमनद झीलें तब बनती हैं जब ग्लेशियर पीछे हटता है और पिघलता हुआ पानी ग्लेशियर द्वारा छोड़े गए गड्ढों में भर जाता है। हिमस्खलन और ग्लेशियरों के हिमखंड गिरने से यह झीलें ओवरफ्लो जाती हैं। ऐसी झीलें बहुत ऊंचाई पर होती हैं, इसलिए बाढ़ के साथ आने वाला मलबा और पानी निचले क्षेत्रों में तबाही मचा देता है। 

देश की तीस लाख की आबादी जद में

वैज्ञानिकों के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग और हिमालय में जारी हलचलों के कारण संकट का सबब बन रही ऐसी झीलों की जद में 30 लाख की आबादी है। इसकेे अलावा बिजली परियोजनाएं, सड़कें, कृषि क्षेत्र भी इनके टूटने की दशा में प्रभावित होंगे। 

क्या है ग्लोबल वार्मिंग, कौन है जिम्मेदार 

यूरोपियन यूनियन की जलवायु परिवर्तन रिपोर्ट बताती है कि पृथ्वी के वायुमंडल में कार्बन डाइआक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड और फ्लोराइड युक्त गैसों के बढ़ने से वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी हो रही है। इन गैसों के उत्सर्जन के लिए मानवीय गतिविधियां सबसे अधिक जिम्मेदार हैं। जंगलों को काटने, जीवाश्म ईंधन जलाने, पशुपालन के कारण पृथ्वी के तापमान पर तेजी से प्रभाव पड़ रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक पेड़, वातावरण से कार्बन को अवशोषित करके जलवायु को नियंत्रित करने में मदद करते हैं। जब उन्हें काट दिया जाता है, तो उनका लाभकारी प्रभाव नष्ट हो जाता है और पेड़ों में संग्रहीत कार्बन वायुमंडल में शामिल हो जाती है। मवेशी जब अपना भोजन पचाते हैं तो बड़ी मात्रा में मीथेन गैस उत्पन्न होती है। नाइट्रोजन युक्त उर्वरक नाइट्रस ऑक्साइड उत्सर्जन उत्पन्न करते हैं। इन गैसों का उपयोग करने वाले उपकरणों और उत्पादों से फ्लोराइडयुक्त गैसें उत्सर्जित होती हैं, जो कार्बन डाईऑक्साइड से कई गुना ज्यादा वैश्विक तापमान बढ़ाती हैं। इसी तरह कोयला, तेल और गैस जलाने से कार्बन डाइआक्साइड और नाइट्रस आक्साइड उत्पन्न होता है, जो वैश्विक तापमान बढ़ाने का कारण बनता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि, 2011-2020 सबसे गर्म दशक दर्ज किया गया था, 2019 में वैश्विक औसत तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर से 1.1 डिग्री सेल्सियस ऊपर पहुंच गया था। 

विकास की दौड़ ने उच्च हिमालय को भी नहीं बख्शा। चमोली जिले के चीन से लगी सीमा पर 18 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित माना पास तक जेसीबी से हिमालय को रौंदकर सड़क बनायी गई। 

विकास की बलि चढ़ रहे हिमालय के जंगल 

पिछले वर्ष लोकसभा में एक लिखित सवाल के जवाब में केंद्रीय पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने बताया था कि पिछले 15 सालों में हिमालयी राज्यों में जंगलों की 305945.38 हेक्टेअर जमीन, विकास कार्यों के लिए संबंधित एजंसियों को हस्तातंरित की गई है। इसमें हिमाचल प्रदेश में 6,696, उत्तराखंड में 14,141, अरुणाचल प्रदेश 12,778 हेक्टेअर जंगल की जमीन शामिल है। अन्य हिमालयी राज्यों में भी बड़े पैमाने पर वन भूमि विकास कार्यों के लिए हस्तातंरित की गई है।

तत्काल उठाने होंगे कदम 

केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि, सन 2100 तक हिमालय क्षेत्र में औसत तापमान में डेढ़ डिग्री तक की बढ़ोतरी हो जाएगी। इसका मतलब बर्फ और ग्लेशियर पिघलने से बनने वाली इन झीलों की संख्या बढ़ेगी और इनका आकार भी। मंत्रालय ने सिफारिश की है कि इस आसन्न संकट से बचने के लिए उन वैज्ञानिक सुझावों पर अमल करना लाजिमी होगा जो हिमालय क्षेत्र में बड़ी बिजली परियोजनाएं स्थापित करने के लिए अन्य रिपोर्टों के साथ ही जलवायु आकलन रिपोर्ट को जरूरी बनाने की पैरोकारी करते हैं। आज ऐसे असामान्य पारिस्थितकीय परिदृश्य में उच्च जोखिम वाली ग्लेशियर झीलों के निचले क्षेत्रों में बांध बनाने से पहले सौ बार सोचे जाने की जरूरत है । खतरे की इन झीलों पर नजर रखने के लिए सटीक और व्यापक निगरानी प्रणाली, उपग्रह इमेजरी, रिमोट सेंसिंग और ड्रोन तकनीक का भी गंभीरता से इस्तेमाल किया जाना आवश्यक है। ज्यादा देर किया जाना ठीक नहीं होगा।  

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