ग्यारह नंबर की गाड़ी 

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यांत्रिकता की औपचारिकता, जोड़-जुगाड़ की उबाऊ प्रक्रिया से जब मन गुजमुजा हो जाता है तो रवाई-जौनसार-बंगाण की अनौपचारिक जमींन की तरफ बैरी पाँव बढ़ने लगते हैं। वहाँ के जंगल, वहाँ के मेले, संस्कृति, बांज के सूखे पत्तों मे चलने का अहसास, पिरूल में नंगे पाँव गुदगुदी होने की अनुभूति छोड़ आते हैं। खांई के रुपहले उपजाऊ खेत, बंगाण के लकड़ी की गंध से महकते साफ़ सुथरे मकान, जौनसार-भाबर का झरने की तरह लबालब करता सौंदर्य, पर्वत की उन्मुक्तता, सभी कुछ कहता है चलो रे पिया के देश। छुट्टी मना, दो टांग की ग्यारह नंबर की गाड़ी तैयार है।

तो रे ! इस ग्यारह नंबर की गाड़ी ने अपने टायर को छाप मार-मार के क्या क्या महसूसा मैं बताऊँ –

जब उत्तरकाषी के पुरोला में पहली ज्वाइनिंग के लिए गया तो चार पहिया बरसात में बडकोट ही थम गयी बस फिर ग्यारह नम्बर की गाड़ी से ही बड़कोट से खूबसूरत राड़ी का डांडा पार कर पुरोला पहुंचा  और तब से सिलसिला पैदल यात्रा का जारी रहा। पहले तो इसका नक्शा भी अजीब है। बंगाण, खांई, जौनसार-भाबर, पर्वत-जमनोत्री सारे क्षेत्र आसपास बहुत करीब हैं पर अपनी-अपनी संस्कृति की मौलिकता लिए। सदियों तक मौलिकता दुरुहता और आपस में अलग-अलग रहने के कारण प्रत्येक क्षेत्र सांस्कृतिक टापू बन गया है। भौगौलिक दुरुहता कुछ ऐसी है की कुछ गाँवों में अभी भी दो पाँवों का आदमी ही चल सकता है। गाँव के लोग कंधे पर बछिया नीचे के गाँव से लाद कर लाते हैं। वह फिर ऊपर ही बड़ा बनता मरता–खपता है। बड़ा जानवर रस्ते पर चल नहीं सकता। यमनोत्री क्षेत्र में कुठार गाँव, टोंस घाटी में नैटवार से ऊपर कलाप गाँव ऐसी ही जगह है। जब ब्लाक वालों ने वहाँ मार्ग बनाया तो खच्चरों को देख कर गाँववासी अचरज में पड़ गए – ये क्या तत्त्व है? उन्होंने धूप अगरबत्ती लेकर खच्चर देवता की पूजा अर्चना की।  

यमनोत्री से नीचे गंगाई, लाखामंडल क्षेत्र हैं। यमुना की सहायक नारद गंगा, हनुमान गंगा, बडियार गाड़, बडकोट गाड़, कमल नदी, भदरी गाड़, तिखनाल गाड़ हैं। तिखनाल गाड़ जिला उत्तरकाशी तथा देहरादून की सीमा बनाती है। जरमोला जंगलों के उस पार टोंस घाटी है। टोंस वस्तुतः तमसा नदी है, जो अंग्रेजों के उच्चारण के प्रताप से टोंस हो गई। इसका उद्गम स्थल हर की दून है। हर की दून बुग्याल है। फूलों की घाटी का ताजापन इसके सीने में खुदा है। टोंस डाकपथर में  यमुना में  विलीन हो जाती है। इसकी मुख्य सहायक नदियाँ सुप्पिन, रुप्पिन, गद्दुगाड,खुनिगाड, पावर हैं। पावर नदी भी अंग्रेजों की उच्चारण की महिमा से पावरों से पावर हो गई। ये त्यूनी में टोंस में  विलीन हो जाती है। यहाँ पट्टियों को ख़त कहा जाता है। दो परगने हैं। रवाई परगने मे यही लंगाण, फत्ते पर्वत, पंचगाई, सिगउर, गद्दुगाड, रामासेराई, कमल सेराई, मुगर खेती, बनाल, टकराल, गेठ्बज़ी है। परगना जौनसार में खतबाना, बिषैल – बनगांव, कोमटट, बहिलाड़,बंदूर आदि। रवाई परगने की ऊँची चोटी स्वर्गारोहिणी, केदारकाँठा और च्यूड हैं।

संस्कृति के सन्दर्भ मे बंगाण हिमाचल से मिला होने के कारण हिमाचल संस्कृति से प्रभावित है। औरतें सलवार कमीज़ पहनती हैं। सर में  ठाठू लगाती हैं। शायद विश्व की हर बाला सर में रुमालनुमा ठाटू अवश्य लगाती है। अल्हड़पन की बातें और भी घनी हो जाती हैं। जौनसार भाबर में घाघरा पहना जाता है। जौनसार-रवाई सभी जगह तीन चार मंजिले मकान होते हैं। निचली मंजिल में जानवर, उसके ऊपर आदमी सबसे ऊपर अनाज भंडार (कुठार) होता है।

देवी-देवता, जादू-टोना, भूत- प्रेत का पूरा प्रभाव व्याप्त है। चुनाव में भी देवी देवता हैं। पांडव कौरवों का प्रभाव पूरे पहाड़ क्षेत्र में है। हिमांचल हो या मुनस्यारी सब ओर पांडव जीन्स में घुसे हैं और यहाँ तो कौरवों का प्रभाव भी प्रबल है। बंगाण – जौनसार में महासू देवता हैं. वो वास्तव में महासुर हैं। पंचगाई में दुर्योधन का प्रभुत्व है। सिंगलूर में राजा कर्ण, नैटवार में सुप्पिन, रुप्पिन, पोखू देवता के मंदिर विशेष महत्वपूर्ण हैं। यहीं मुकदम्मे, कस्में बार-बार होती हैं। पोखू का वीर जहाँ लगता है वहाँ विनाश करता है और अपने निशान छोड़ जाता है, इसकी पूजा पीठ करके होती है। महासू का मुख्य मंदिर प्राचीन है। मंदिर हनोल और देवती देववन मे स्थित है। छोटी और वास्तविक मूर्ति दिखाई नहीं जाती। अष्टधातु निर्मित मूर्तियाँ बुद्धकालीन हैं। देववन का जंगलीपन सर-आखों पर रखने लायक है। जीवन की अबाधता का यह ठहराव बहुत समय तक मडुए की शराब के नशे की तरह छाया रहता है। पलकों के गिर-गिर जाने की मादकता। लाखामंडल गुफाओं के संसार से घिरा है। संभवतः प्राचीनकाल में यह क्षेत्र मूर्तिकला का निर्माण केंद्र रहा होगा। हर की दून और भराटसर में, पंचगाई क्षेत्र में, आधा किलोमीटर लम्बी झील है। आठ हज़ार फीट की ऊंचाई पर बसे इस स्थल का सौंदर्य कोई कोई दिलवाला ही सहन कर पाता है। अपनी ग्यारह नंबर की गाड़ी यहाँ जाम हो गई थी। अन्दर का हर कोश ब्रेक दे गया था। यहाँ लिंग की तरह खड़ा पत्थर चौकोर है। लगता है जैसे किसी अदृश्य छेनी ने काट-काट कर स्थापित कर दिया है। देववन ठडयार से ऊपर है। वहाँ झील के बीच से बना मंदिर अपने सौंदर्य के नक़्शे को ह्रदय में देख के इतराता है। घनघोर जंगल के बीच देवदार के विशाल वृक्ष अभी जहन से नहीं उतरे हैं। भाषाओं में भी  परस्पर अंतर है। कहाँ जा रहे हो? को- किंदे नोशे (भाबर में), कोइक नोशे (जौनसार में) कोक नोशे (फत्तेगाँव) क्यार नोशे (पंचगाई में) कहा जाता है। जौनसारी को बोलते देख तो मुझे सदा पश्तो का भ्रम सा होता है। उच्चारण का ठाट वही है।

पर्वत का पूरा इलाका रहस्यवाद से भरा है। पर्वत का इलाका आध्यात्मिक लोक के लिए प्रसिद्ध है। बहुत से प्रत्यक्षदर्शियों ने तीसरे आयाम का संसार भी देखा है। एक गडरिया किसी तरह इस लोक में पहुचा तो उसने देखा की एक बूढा ऋषि मार्का व्यक्ति अपनी सफ़ेद पलकों को पकडे कुछ पढ़ रहा है। गडरिया को तम्बाकू की तीस लगी थी। वही  ढूँढने आया था। वृद्ध ने कहा, “क्या चाहता है बेटा?” । उसने कहा, “तम्बाकू”. तब उसे ऐसा तम्बाकू मिला जिसका धुआँ सारे पर्वत को वर्षों तक महकाता रहा। उसी तरह एक वृद्ध ने घास माँगी थी। तब से वह जितनी काटता उतनी घास ढेर हो जाती। ये सब सुनने का आनंद मैंने लिया। पर मैंने स्वयं ऐसे क्षेत्र को देखा, जहाँ बड़े-बड़े उखलों पर सुबह उठने पर ऐसा लगता है जैसे किसी ने कुछ कूटा है। चोकड़ फैला रहता है। अखरोट, मिर्च खूब बड़े बड़े। अखरोट की गिरी इतनी बड़ी व साबुत कि मजा आ जाए। मिर्च इतनी चटपटी कि मुँह में लगते ही सी-सी-इ-इ हज़ार बार। पर निश्चित क्षेत्र से बाहर लाओ तो गिरी सड़ जाती है और मिर्च मुरझा जाती है। मैं न परम्परागत गुरुवादी हूँ और न वैज्ञानिक रुढ़िवादी, फिर भी यह सब देखकर अच्छा लगा। हम सबको भगवान तो चाहिए ही।

पर्वत में जड़ी-बूटियों का जखीरा है। बाहर के राक्षस ठेकेदार खोद-खोद कर धरती उखाड़े दे रहे हैं। गुगुल, अतायासा, नीलकंठी, कचूर-पेट दर्द, कौड़ाई, बनपसा-जुखाम, अर्चा, गंतर के लिए मोती जहर है. नकदूण भूख न लगने वाली कंद है. गडरिये जब खाना नहीं मिलता तो इसे खा कर दिनों भूखे रहते हैं। सेव ओस्ला, फत्तेपर्वत,बंगाण में. दुचौणु, किराणु भौड़ा सुदूर ऐसे गाँव है जहाँ जाने का दावा या तो सूर्य करता है या सरकारी कागज. यह तो बड़ा प्रसिद्ध वाकया है कि जब वहां यात्रियों ने पूछा कि यहां एमएएलए आते हैं तो उन्हें हुआ कि ये किस आलू की किसम हैं। वहां गेदुड़ा, जो रग्बी, बास्केटबाल का मिक्स जैसा खेल खेला जाता है. एक जड़ीबूटियों की रंगीन फुटबाल बनायी जाती है जिसे गोलपोस्ट में डालने के लिए शुरूवात उपर फेंक के की जाती है जिसे पकड़ ले तो कहा जाता है उसका लड़का होगा। वह उसे ले के भागता है सब उससे छीनने जाते हैं।

मेलों ठेलों की बहार है। रवाई के लोग मस्त-मौला मुकद्दमा प्रिय हैं। लेचुआ का मेला, मछली मारने का मेला। वैसे अब बिना मेले के ठेकेदारों इंजिनीयरों के खूनी दाँत मछलियों के अण्डों, जाति तक गढ़ चुके हैं। नदी में ब्लीचिंग पाउडर डाल कर मीलों तक के मछलियों के वन समाप्त हो रहे हैं। यहाँ के लोग परंपरागत रूप से मछलियाँ तिमरू के बीज पीस कर मारते थे, जिससे मछलियाँ ढंग से और कम मरती थी। पर अब तो ब्लीचिंग ब्लास्टिंग से मत्स्य संहार अनंत रूप से हो रहा है। वन विभाग खामोश है। उसी प्रकार यहाँ से च्यूरे के बीज विदेश में भी जाते थे। सारे क्षेत्र में गोरखा मजदूरों के माध्यम से जंगल कटान से लेकर हर तरह का विष फैलाकर यहाँ की मस्त वादियों में जहर घोलना शुरू किया है। शराब के ठेके इन्ही के अब चल रहे हैं।

यहाँ की शराब का आनंद बंदा भी भूल से ले चुका है। क्या मस्ती टपकी थी उस दिन! यहाँ मुख्यतः शराब हेतु जड़ी बूटियों को पीस कर केक सा बनाते हैं। जिसे कीम कहते हैं। फिर उस केक को सुखाने रख देते हैं। उसमें फिर जौ मिलाई जाती है। कीम की शराब हो और गढ़ी–बलखाई अँगुलियों से छू कर जब जब आती तो दो तरफ़ा शराब की ताव सहना उमर  खय्याम के ही बस की बात है। जब जब आती तो दो तरफ़ा शराब की ताव सहना उमर  खय्याम के ही बस की बात है. उस दिन मैं अपने बंगाण के एक मेजबान के साथ उनके घर भोटाणूं चला। पुरोला से खूनी गाड़ होते खूबसूरत नदी जंगल के साथ साथ चलते षाम हो गयी। वह फिर अचानक ’ जरा सा’ कहके गायब हो गये। वापस आये तो वह जरा सा बहुत थी। खूब बारिष होने लगी। रात घनी हो गयी । वह मेरे गाइड थे पर मैं उनका गाइड बना और एक स्पॉट में वह चित्त हो गये अपनी बोतल के साथ। मेरे साथ करने को कुछ नहीं था। उस घने एकांत अंजान में कहां जाऊ वाले हालात थे। तभी लुढकी बोतल दिखी। अब क्या करता उसे ही अपने अंदर उडेल कर कुछ  राहत पानी चाही पर उसमें एक बूंद भी कसम खाने को न थी। अच्छा ही हुआ चुल्लू भर पानी में इमान न डूबा। किसी तरह उन्हें जगाया। फिर वह लड़खड़ाते चले। मैं भी उन्हें  लिये दिये अपने को सम्भालते मट्टी जो चिकनी हो गयी थी, उसमें ब्रेक और बैक गियर लगाते उनके घर पहुंचा।  सुबह हो गयी थी। मैं गर्म बिस्तरे में अब था। तभी एक युवती आयी उसने मुझे गिलास में पानी दिया । पिया तो गला जला ! समझ गया मुझे तो सुबह-सुबह जगाकर दी गई थी। मैंने सोचा कुछ रिवाज़ होगा सुबह उठते ही पानी पिलाने का। पर जब गले में गर्मी अटकी तो मैंने प्रश्न वाचक आखें उन आखों में तैरा ही दी। क्षमा याचक शब्दों में कहा गया – गुरु जी क्षमा… मडुवे की ख़तम हो गई… शाम को जितनी चाहो। उसने सोचा मेहमान नाराज़ हैं। मडुए की न मिलने से। फिर जब शाम आई तो ऐसी शाम थी कि जिंदगी की आखरी शराबमय शाम बन कर रह गई।

मेहमान नवाजी का ये आलम है कि आपके थके- मांदे पावों को घर की रूप गर्विता धोती है। फिर उसे पी लेती है। आज तो यह रिवाज कम हो गया है क्यूंकि नई पीढ़ी नाराज है। रिश्तेदारों के ही अब हाथ पाँव धुलते हैं, पर दूरस्थ गांवों में अभी भी है। वृद्ध पीढ़ी कहती है हमारी संस्कृति एक्का-संगठन के लिए जबरदस्त चीज है पर गई पीढ़ी नहीं मानती। अब सब थेची रहा है। वर्ना पहले लड़की धूमधाम से लड़के के घर विवाह के लिए जाती थी। तीन चार दिन वहीं दौर पर दौर चलते थे। आल्हाद ! ख़ुशी !! इतना जिंदादिल खुश इलाका मैंने नहीं देखा। न तिब्बत, न नेपाल, न कुमाऊ-गढ़वाल का कोई अन्य क्षेत्र, पर अब सब धंस रहा है। जंगल कट रहे हैं। बांज साफ़ हो रहा है। तन की प्रफुल्लता को बाहर का लुटवा लिए जा रहा है। जानवर मर रहे हैं। वरना रवाई के मौण के मेले में और पर्वत में बर्फ पड़ने पर जानवर को घेर कर मारते थे (इस प्रक्रिया को ऐढ कहते थे) पर गोरखा सब कस्तूरी खा गया है। गन्दी शराब ने ‘मूल संस्कृति’ की जड़ में मट्ठा  डाल दिया है। गोरखा मजदूरों ने तीन चीजों का प्रचलन यहाँ किया है। बीड़ी, गुड की शराब और जुआ। गोरखों ने जंगल तो साफ़ किये हैं। फांसी लगा कर जंगली जानवर भी समाप्त किये हैं। इस फांसी में कभी घरेलू जानवर भी दम तोड़ देते हैं। इन्हे कौन समझाता? इस विजातीय संस्कृति ने मस्त आलम को तोड़ना प्रारम्भ किया है।

जौनसार में धनुष बाण का मेला लगता है, जिसमे एक पक्ष बाण से घुटने से नीचे दूसरे को मारने का प्रयत्न करता है। दूसरा पक्ष बचाव पर होता है। डींग मारी जाती है। पूस के महीने में बकरी कटाई होती है। पीने पिलाने, नाच गान की  जितनी जबरदस्त उमंग यहाँ देखी वह कम ही दिखती है। छिलकों के प्रकाश में नाचते कदमो की लय अद्वितीय है। किसी मणिपुरी, कुचिपुड़ी से कम नहीं।

दीवाली सारे इलाके में मंगशीर में मनाई जाती है न कि कार्तिक में। सम्पूर्ण में मै जहाँ जहाँ घूमा  नई – पुरानी पीढ़ी का संघर्ष देखा। नई पीढ़ी अपनी संस्कृति को लेकर शर्माने लगी है जबकि ऐसी संस्कृति अद्वितीय ही होती है। सांस्कृतिक विलंबना चल रही है। ठेकेदारों ने यहाँ के जंगल, अखरोट, घी खाया ही साथ में संस्कृति में भी अपराध भाव का बोध नई पीढ़ी को कराया है। वो अपनी पीढ़ी की संस्कृति म्यूजियम में भी नहीं रखना चाहते हैं। जागर में आज नई पीढ़ी के लड़के नाचते दिखते नहीं। वरना क्या स्टैप थे! क्या मस्ती थी! आनन्द डिफाईन होता। आज यहाँ तकनीकी साम्राज्यवाद है तो इस बाजार के सुख दुख हैं पर जिसे मजा कहते हैं वह तो गया धारम धार। तन का सुख आया मन का सुख गया। आज जो जनजातीय संस्कृति के विलुप्त होने खतरा सारे भारत में है, वो यहाँ भी है। पहचान गयी तेल लेने। आज पहचान यहाँ भी नोट है। भ्रष्टाचार की नीव में खड़े पुलों ने इन सांस्कृतिक टापुओं को आपस में मिला तो दिया पर इस पुरातत्वीय संस्कृति का खुदान इतने अवैज्ञानिक ढंग से किया है कि जब फिर यहां लौट के गाड़ी में आया तब दस साल पहले जो मजा ग्यारह नंबर की गाड़ी को आया वह आज नहीं आया। बहुत पंक्चर लग गये उसमें। पर्वत, फते पर्वत वह भराड़सर का बुग्याल। उखड़े उखड़े कदम जब उदास दानवी गाड़ी में बैठे तो टूटी गाड़ी के तरह ऐश्वर्यहीन वो दुखी थे, बहुत दुखी।

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यह यात्रा १९७० में की गई थी. उसी का विवरण है।    

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