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सागरमाथा और एडमंड हिलेरी

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एशिया के बीचों-बीच जो हिमालय शिखर पिछले 6 करोड़ साल में विकसित होकर उपस्थित है और हर साल 2-4 मिलीमीटर ऊपर उठ रहा है, तिब्बत में चोमोलंगमा तथा नेपाल में सागरमाथा नाम से पुकारा जाता है। यह शिखर सदियों से इस क्षेत्र के लोगों का सुपरिचित और पूज्य था। इसके सौन्दर्य और मिथकमयता से ये लोग सुपरिचित थे। यदि इन हिमालयी समुदायों को पता नहीं थी तो वह थी इस शिखर की वास्तविक ऊँचाई। यद्यपि उन्हें इसके सर्वोच्च होने का पारम्परिक विश्वास था। इसीलिए तिब्बती इसे ‘विश्वमाता’ कहकर पर्वतों के प्रति मूल मानव आस्था को प्रकट करते तो नेपाली इसे ‘सागरमाथा’ कहकर उस भूगर्भिक सत्य को उजागर करते कि हिमालय की जगह कभी ‘टैथिस’ समन्दर लहराता था।

चोमोलंगमा या सागरमाथा या एवरेस्ट में 29 मई 1953 को पहली बार मनुष्य पहुँच सका था। इसी शिखर पर तिब्बत की तरफ से चढ़ने की पहली कोशिश को 100 साल होने जा रहे हैं। तीसरे और उस समय के अंतिम अभियान में इस शिखर के बहुत करीब पहुँचने वाले और फिर उस ऊँचाई में हिम समाधि लेने वाले जार्ज मैलोरी तथा सैण्डी इरवीन के दुखद पर यादगार अंत को भी आज 96 साल हो गये हैं। ये सब लोग हिमालय के आकर्षण से अभिभूत ही नहीं थे बल्कि उसके लिए चिंतित भी थे। हिमालय का पर्यावरण उनकी चिंताओं के केंद्र में ही था। आज जब हिमालय के पर्यावरण पर पूरी दुनिया चिंता दिखा रही है हमे इसे सम्पूर्णता में समझना होगा।

चोमोलंगमा या सागरमाथा पर चढ़ने वाले वाले शेरपा तेनजिंग नोरगे और एडमंड हिलेरी ने शिखर पर पहुँचने  के बाद ही एहसास किया कि इतना आकर्षक पर्वत शिखर बहुत नाजुक और संवेदनशील तो है ही, इसके चारों रहने वाला वाला समाज भी उतना ही बाहरी दबावों के खतरों से घिरा है। एडमंड हिलेरी ने अपने अनुभवों और चिंताओं को नेशनल ज्योग्राफिक में प्रकाशित किया। आज बाजारवाद की दौड़ में जब दुनियाँ में बिना मनुष्य और प्रकृति के रिश्तों को गहराई से समझे इन नाजुक पर्वत शिखरों को जीत लेने का दुस्साहस बढ़ता जा रहा है या फिर सरकारों द्वारा पर्यावरण के नाम पर हिमालय को वहाँ रहने वाले आदमी से अलग काट कर देखा जा रहा है, हिलेरी का यह लेख हमें इस भूगर्भीय संरचना के बहाने परिस्थितिकी और पर्यटन के अंतर्सम्बन्धों को समझने की दॄष्टि देता है। आम हिन्दीभाषी पाठकों तक पहुँचाने के लिए डॉ शेखर पाठक ने इस लेख का हिन्दी अनुवाद किया है।

एवरेस्ट की वन्यता और सौन्दर्य को बचाने की कोशिशएडमंड हिलेरी

मैं पहले पहल एवरेस्ट शिखर में 1951 में एरिक लिफ्टन के बर्तानवी दल के साथ गया था। हमारा लक्ष्य दक्षिणी ढाल से शिखर का रास्ता अपनाना था। मानसूनी मौसम में हम ठंडी ऊँचाईयों और बाढ़ग्रस्त नदियों से लड़ते हुए नेपाल को पार करते रहे। 12 सितम्बर को हमने चौनरीकर का दर्रा पार करते ही बेहद सुंदर जंगलों से भरपूर दुधकोसी का दर्शन किया। शेरपाओं का पवित्र खुम्बिला शिखर यहाँ से साफ दिख रहा था और हम जानते थे कि हमारा दल एवरेस्ट शिखर के आसपास स्थित जिला खुम्बू की ओर बढ़ रहा है। यह शेरपाओं के इलाके का केन्द्र है।

अगले दिन हम चीड़ के जंगलों से होकर चड़ाई चढ़ते रहे और नामचे बाजार पहुँचे। यह पूरा इलाका सघन हरियाली से भरा हुआ था। गाँव के नीचे खड़े भव्य कोनीफरों के बीच से सामने की बर्फ और हिम पगी पहाड़ों की झलक दिख रही थी। हम चलते-चढ़ते गए और 4 हजार मीटर स्थित थ्यान्गबोक मठ में पहुँचे। यहाँ का आस पास भी जंगलों और असाधारण पहाड़ों से भरपूर था। सामने एवरेस्ट के दोनों ओर के शिखर नुप्तसे (7879 मी) तथा ल्होत्से (8501 मी) खड़े थे। प्रभावशाली और विशाल।

हम पुराने मठों और लम्बे जूनीपर पेड़ों के लिए स्मरणीय गाँव पाँगबोक पहुँचे। यहाँ से ऊपर को सभी जूनीपर छोटे कद के होते चले जाते थे। पर जहाँ जंगल कायम हैं, वहाँ ईधन की पर्याप्त लकड़ी उपलब्ध थी। जैसे ही हमने खुम्बू ग्लेशियर की घाटी में प्रवेश किया, जंगल गायब हो गए। लेकिन जूनीपर की गहरी हरी झाड़ियाँ   पहाड़ी के ढाल को ढके थी और सूखी घास को याक चर रहे थे।

खुम्बू ग्लेशियर की जड़ पर आधार शिविर बनाया और हम निश्चिन्त हुए कि दक्षिणी ढलान से शिखर के लिए रास्ता है। दो साल बाद 29 मई 1953 को मेरा शेरपा सहयोगी तेनजिंग नौर्गे और मैं ऐवरेस्ट के शिखर पर पहुँचने में कामयाब हुए।

हाल तीस साल बाद

लगभग 30 साल बाद मैंने इस यात्रा को दोहराया। दुधकोसी नदी की घाटी अब भी बहुत सुन्दर थी। लेकिन जंगल शेरपाओं की कुल्हाड़ियों और आरियों से दयनीय रूप से पतला किया जा चुका था। नामचे बाजार के नीचे तमाम पेड़ नेपाली भारवाहकों की खुकरियों से छाँटे-काटे जा चुके थे, जो कि पेड़ों की शाखाओं और छाल को जलाने हेतु ले जाते रहे थे। थ्यान्गबोक के आसपास के जंगल अपने विशाल और सघन पेड़ों को खो चुके थे तथा पान्गबोक का इलाका तो एक प्रकार से खाली हो चुका था। खुम्बू घाटी से ऊपर हमें कोई भी जूनीपर नहीं दिखा।

ऐसा क्या हुआ था जिसके कारण इतना बदलाव नजर आता था? हमारी एवरेस्ट विजय अनेक देशों के पर्वतारोहियों को इस क्षेत्र में ले आई। ये सब दुनिया के सर्वोच्च शिखर पर पहुचने की आकाँक्षा रखते थे। विभिन्न अभियानों हेतु ईधन की आवश्यकता का दबाव पर्याप्त रूप से फैले हुए जूनीपरों पर पड़ा। लेकिन प्रारम्भ में इस हेतु जंगलों को मुक्त रखा गया।

इस प्रकार अनजाने ही जंगलों के इस विनाश के लिए मैं जिम्मेदार था। छटे दशक के प्रारम्भ में मैंने स्कूलों के भवनों, अस्पतालों, पुलों का निर्माण कर और पानी के नलों को लगाकर अपने शेरपा मित्रों की मदद करने की कोशिश की। निर्माण सामग्री के ढुलान में मदद हेतु मेरी मंडली ने लुक्ला में हवाई पटटी का निर्माण कराया। लेकिन इस हवाई पटटी में निर्माण के अनपेक्षित प्रभाव हुए। इसने एवरेस्ट का रास्ता सरल और छोटा कर दिया किया। सैलानियों और पथारोहियों की बढ़ती संख्या ने ईधन की माँग को अप्रत्याशित रूप से बढ़ा दिया।

1973 तक मुझे यह महसूस होने लगा था कि यदि खुम्बू जिले को रेगिस्तान होने से बचाना है तो किसी न किसी प्रकार का नियन्त्रण किया जाना अनिवार्य है। खुम्बू एक दूरस्थ इलाका था। वहाँ सरकारी प्रशासन चलाना जितना कठिन था उतनी ही दिक्कत सरकारी अनुदानों के वहाँ पहुँचने में थी। इसका एक ही उत्तर समझ में आता था और वह था एक राष्ट्रीय पार्क की स्थापना करना।

अक्टूबर 1973 में मैंने काठमांडू में संयुक्त राष्ट्र के वन्य मामलों के सलाहकार से बातचीत की, जो स्वयं नेपाल के राष्ट्रीय पार्कों के निदेशक बी.एन. उप्रेती से बातचीत कर रहे थे। यह महसूस किया गया कि बाहरी सहायता की जरूरत है। न्यूजीलैण्ड एक ऐसा देश था, जो स्थलाकृतिक दृष्टि से नेपाल की तरह था और राष्ट्रीय पार्कों के मामलों में अति विकसित भी। क्या न्यूजीलैण्ड सागरमाथा (यह एवरेस्ट हेतु नेपाल का सरकारी नाम है) राष्ट्रीय अभयारण्य की स्थापना में मदद हेतु तैयार होगा?

मैंने न्यूजीलैण्ड के विदेश मंत्रालय से इस सम्बंध में बातचीत की और आश्चर्यजनक रूप से इस मामले पर तुरन्त कार्रवाई हुई। तीन सदस्यों का एक दल जाँच पड़ताल हेतु नेपाल गया और उसने अपनी आख्या पक्ष में दी। 1975 में न्यूजीलैण्ड के राष्ट्रीय पार्कों का सलाहकार दल पहली बार नामचे बाजार तक गया। यहीं से सागरमाथा अभयारण्य का प्रारम्भ होता है।

व्यापक बदलाव

सातवां दशक खुम्बू में व्यापक विस्तारण का काल था। अब हर साल पाँच हजार विदेशी पर्वतारोही ऐवरेस्ट क्षेत्र में आने लगे थे। दर्जनों होटलों की स्थापना हो चुकी थी। चाय और छंग (बीयर) की दुकानें बढ़ती चली गई थी। नामचे बाजार की साप्ताहिक हाट अब भीड़ भरी होने लगी थी। क्योंकि अब यहाँ के निवासी (दुकानदार) आगन्तुकों (पर्वतारोहियों और भारवाहकों) को राशन और ईंधन बेचने लग गए थे। जैसे-जैसे जलाने तथा निर्माण कार्यों हेतु लकड़ी की जरूरत बढ़ती गई, जंगल समाप्त होते गए।

इन सबका इलाके पर जबर्दस्त दबाव पड़ा। लेकिन इससे बड़ी समस्या यह थी कि शेरपाओं को राष्ट्रीय अभयारण्य के बाबत शक था। उन्हें इस बात की चिंता थी कि अभयारण्य की स्थापना से न सिर्फ उनके ईधन पर रोक लग जायेगी वरन चारागाहों में उनके याकों-जानवरों का चरना भी बंद हो जाएगा। वे यहाँ तक सोचने लगे कि उन्हें अभयारण्य से बाहर निकाल दिया जाएगा और वह क्षेत्र सिर्फ पेड़ों, जंगली जानवरों और सैलानियों के लिए छोड़ दिया जाएगा।

1976 के पंचायतों के चुनाव के समय सभी प्रमुख उम्मीदवार राष्ट्रीय अभयारण्य की स्थापना के विरूद्ध थे। मेरे एक पुराने मित्र खुन्जो चुम्बी जो कि मेरे अभयारण्य सम्बन्धी मूल विचार से परिचित थे, ने अपने एक भाषण में टिप्पणी की थी कि हिलेरी ने हम शेरपाओं को सबसे पहले चीनी का स्वाद चखाया था। लेकिन आज वह हमारी आँखों में नमक डाल रहा है।

मैं यह जानता था कि उसका तर्क वाजिब था। विदेशों से आए हजारों सम्पन्न पर्वतारोहियों/सैलानियों द्वारा दिया जाने वाला आर्थिक प्रलोभन आकर्षक था। स्थानीय लोगों द्वारा ईंधन की लकड़ी पर नियन्त्रण का प्रतिरोध किया गया, जिससे अभयारण्य स्थापना की प्रक्रिया मन्द पड़ी और ईंधन हेतु लकड़ी का प्रयोग न किए जाने हेतु बने अधिनियमों को कार्यान्वित नहीं किया जा सका। नामचे बाजार में ईंधन के अन्य स्त्रोतों, जैसे गैस और मिटटी तेल, को उपलब्ध करा कर भी इनका प्रयोग व्यापक नहीं हो सका। र्इंधन की समस्या अत्याधिक गम्भीर बनी रही।

शेरपा स्थिति समझें

न्यूजीलैण्ड के सहायता कार्यक्रम की अवधि समाप्त हो गई है। अब नेपालियों ने स्वयं अपना मामला देखना है। शेरपा मिन्गमा नोरबू, जिन्होंने पाँच साल तक न्यूजीलैण्ड में प्रशिक्षण प्राप्त किया था, अब जंगल तथा अन्य बाहरी कार्यकलापों के प्रभारी है। सागरमाथा राष्ट्रीय अभयारण्य का भविष्य बहुत कुछ उनकी प्रतिभा और सक्रियता पर निर्भर है। यदि वे अपने लोगों को अभयारण्य के कार्यक्रमों में सहकारी बना सके, यदि वे अपनी र्इंधन सम्बन्धी माँग के बारे में अक्खड़ रहने वाले पर्वतारोहण अभियानों को अनुशासित कर सके, यदि वे यह सुनिश्चित कर सके कि पथारोही और सैलानी अपने साथ जरूरत का र्इंधन लेते आए, तो कदाचित अभयारण्य सफल हो जाएगा और एक जग प्रसिद्ध इलाका अपनी वन्यता और सौन्दर्य के साथ कायम रहेगा।

एक ओर असाधारण राष्ट्रीय अभयारण्य की स्थापना और दूसरी तरफ एक जंगल विहीन हिमालयी रेगिस्तान – यदि साहस और कल्पनाशीलता को साथ लेकर मुस्तैद रहा जाय तो यह एक शानदार अभयारण्य बन सकता है।

ऐवरेस्ट जेसे दुनियां के सर्वोच्च शिखर में चढ़ने की लालसा हर पर्वतारोही की रही है । 1920-30 के बीच पहली बार ऐवरेस्ट में उत्तर की ओर से चढ़ने की कोशिशें हुई थीं। 1950 में जब यह इलाका खुला तो काठमांडू से 175 मील चल कर जाना पड़ता था। ऐवरेस्ट की दक्षिणी ढाल से रास्ता खोजे जाने पर न्यूजीलैण्ड के एक मुधमक्खी पालक एडमन्ड हिलेरी और ऐवरेस्ट के अभियानों में सातवीं बार जा रहे तेनजिंग नौर्गे ने शिखर में चढ़ने में सफलता हासिल की। जब यह क्षेत्र खुला तो हवाई पटिटयाँ बनने से हर साल पाँच हजार पर्वतारोही यहाँ आने लगे और फिर शुरू हुआ पर्यावरण के नुक्सान का सिलसिला। इसे रोकने के लिए एडमन्ड हिलेरी की पहल और सागरमाथा क्षेत्र को राष्ट्रीय अभयारण्य बनाने का विचार आगे बढ़ाया सागर 1981 में नेपाल ने 480 वर्ग मील में फैले सागरमाथा क्षेत्र में अभयारण्य का कार्य शुरू किया।

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